Wednesday, July 21, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - ३

सरकारी छात्रावास में दाखिला

ऐसा लगता है कि काफ़ी सोचने और यह देखने के बाद कि मैं सुबह-शाम मौसी के साथ रहने को लाचार हूं जो मेरी पढ़ाई के लिए अच्छी बात न थी, बाबू ने जुलाई १९३४ में मुझे नैनीताल में क्रेगलैन्ड के नाम से जाने जाने वाले सरकारी छात्रावास म्रं भर्ती करा दिया. तब मैं नौ साल का था. इत्तफ़ाकन में छात्रावास में सबसे कम उम्र का बच्चा था. मुझे एक सीनियर के साथ एक कमरे में जगह दी गई.

हमारा छात्रावास एक पहाड़ी की पूर्वोन्मुख चोटी पर था जहां अलस्सुबह बढ़िया धूप आया करती थी. एक छोटा सा मैदान था जिसमें बच्चे हॉकी खेलते थे. मैं भी इसमें हिस्सा लिया करता. वहां से भाबर, सामने की पहाड़ियों और ज्योलीकोट के आसपास के गांवों का नज़ारा देखने को मिला करता था. ज्योलीकोट से नैनीताल आने वाली सर्पिल सड़क का दृश्य सबसे मनोहारी हुआ करता.

हॉकी खेलते हुए गेंद अक्सर पहाड़ी की चटियल ढलान पर लुढ़क जाती और सबसे छोटा होने के कारण सीनियरों के निर्देशों का पालन करते हुए मुझे ही उसे वापस लाने का काम करना होता था. आमतौर पर मैं गेंद खोज लाने में कामयाब हो जाया करता.

हम सब मैस में साथ खाना खाया करते. हमारा स्कूल करीब एक किलोमीटर नीचे स्थित था. थोड़े शब्दों में कहूं तो घर की चहारदीवारी में घिरे जीवन की तुलना में यह सब बिल्कुल फ़र्क़ था. अपनी छोटी उम्र के बावजूद मैंने समाज के ढांचे को पहचाना और एक दूसरे की सहायता करने की ज़रूरत को भी.

इत्तफ़ाकन हमारा घर तल्लीताल बाज़ार के उस हिस्से के नज़दीक था जहां वैश्यावृत्ति होती थी. कुछ सीनियर लड़के जो यह जानते थे कि मेरी मां नहीं है, मुझे "मालती का बेटा" कह कर पुकारा करते. मालती एक नाचने-गाने वाली औरत थी. इस पर मेरी प्रतिक्रिया बहुत तीखी हुआ करती थी. धीरे धीरे मैं समझ गया कि जितना मैं जवाब दूंगा उतना ही मुझे सुनना पड़ेगा. सो जल्द ही यह मामला समाप्त हो गया.

शारिरिक गतिविधियों, खूब चलने फिरने और स्कूल आने-जाने के कारण मेरी देह काफ़ी चुस्त और तन्दुरुस्त हो गई. अब अपने छात्रावास के वार्डन पंडित जोशी की प्रशंसा में कुछ. वे हमारी नियमित गतिविधियों पर निगाह रखे रहते थे. वे सुनिश्चित कर लेते थे कि शाम का भोजन गोधूलि से पहले ले लिया जाए. फिर वे हर कमरे का मुआयना करते थे कि सारे बच्चे कमरों के भीतर हैं और पढ़ाई में लगे हुए हैं. वे ज़्यादातर समय खुले बरामदे में बिताया करते और वहीं सोया भी करते थे. इससे वे किसी भी तरह के शोर या लड़ाई झगड़े को सुन सकते थे. छात्रावास के पहले दो सालों यानी १९३६ के जून तक जीवन मज़े में कटता गया.

जीवन के प्रति बाबू के रुख में एक और बदलाव

मई १९३५ या उसके आसपास बाबू एक महीने की छुट्टी लेकर पुनः द्रोणागिरि चले गए. इस बार वे उत्तर प्रदेश - बिहार की सीमा से लगे बलिया-छपरा से आए एक कबीरपन्थी सन्त बाबा सदाफल के संसर्ग में आए. मैंने बाद में ध्यान दिया कि उन्होंने देवी उपासना यानी पूजा पाठ छोड़ दिया था और केवल ध्यान और बाबा द्वारा संकलित एक पुस्तक से दोहों का पाठ किया करते थे. इस साल उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से अपनी छुट्टी बढ़वा ली और नैनीताल वाला किराए का घर छोड़ कर नैनीताल-भीमताल पैदल मार्ग पर कोई ग्यारह मील दूर विनायक नामक गांव में जाकर रहने लगे. कक्षा छः के समूचे शैक्षिक सत्र के लिए मुझे भी छात्रावास से हटाकर उनके एक दोस्त के घर रख दिया गया - सिवाय सर्दियों की छुट्टियों के जिन्हें मैं हमेशा हल्द्वानी में बिताया करता था.

अगले साल यानी जुलाई १९३७ में मुझे दोबारा उसी छात्रावास में दाखिल करा दिया गया. इस बार मेरा साथी एक सहपाठी था. हमारे वार्डन भी बदल गए थे. हम दोनों ने तीनपत्ती वाला ताश खेलने की बुरी आदत लगा ली थी - जिसे हम छात्रावास द्वारा उपलब्ध कराई गई मोटी रज़ाइयों के नीचे लालटेन की रोशनी में खेला करते थे. इसके अलावा हमें सिनेमा के नाइट शो देखने का चस्का भी लग गया था जो साढ़े नौ बजे से शुरू होते थे. हम एक एक कर छात्रावास से बाहर निकलते - जूते हाथों में थामे हम करीब सौ मीटर तक नंगे पांव बिना आवाज़ किए चलते और वहां से सिनेमा हॉल. हम सबसे आगे की कतारों में बैठा करते. टिकट सवा दो आने यानी पन्द्रह पैसे का होता था. कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, सो हम छात्रावास का दरवाज़ा बाहर से बन्द कर दिया करते थे जो उसके अन्दर से बन्द होने का भ्रम देता था और इस बात का भी हम सब भीतर ही हैं. रात करीब एक बजे हमारी वापसी होती और इस बार कुन्डी अन्दर से लगा दी जाती.

इसी बीच अप्रैल १९३७ में बाबू ने नैनीताल-भवाली रोड पर करीब छः किलोमीटर दूर जखिया नामक गांव में एक दुमंजिला मकान किराये पर ले लिया. बाबू पर बाबा सदाफल का ऐसा जादू चल चुका था कि उनके जीवन का सारा उद्देश्य गुरुजी के उपदेशों से संचालित होने लगा था. इसके अलावा १९३७ की गर्मियों में बाबा नैनीताल आ बसे थे जहां उन्होंने करीब बीस चेले बना लिए थे. उनमें से ज़्यादातर को बाबू पहले से जानते थे.

बाबू ने मुझे बाद में बताया था कि बाबा के कहने पर वे १९३६ के अन्तिम दिनों में कलकत्ता हो कर आए थे. औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों में बाबा की अच्छी खासी पैठ थी. गुरू के कलकत्ता में रहने वाले चेलों ने उनके सम्मान में एक बैठक आयोजित की. बाबू का अनुमान है कि उसमें करीब पच्चीस हज़ार लोगों के शिरकत की थी. बाबा को सर से पांव तक फूलों से लाद दिया गया था. उनके चेहरे का अनुमान सिर्फ़ उनकी दो चमकती आंखों से लगाया जा सकता था. बाबा को नज़राने के तौर पर करीब एक लाख से ऊपर की रकम जुटाई गई. बाबू शायद इन सब वजहों से बाबा के मोहपाश में बंधते चले गए.

वहीं बाबा के प्रति बाबू की अतीव भक्ति के कारण पारिवारिक जीवन सम्भवतः काफ़ी हद तक तबाह हो गया होगा. सो उनके और रामी मौसी के बीच नियमित लड़ाइयां होतीं जिनमें एक दूसरे पर इल्जाम लगाए जाने का सिलसिला चला करता. मुझे १९३७ में उनसे मिलने जाने की एक या दो बार से ज़्यादा की याद नहीं है. जहां तक मुझे याद पड़ता है उनमें बोलचाल बन्द थी. मेरा ख्याल है १९३८ की गर्मियों के आते आते उनके सम्बन्ध बद से बदतर होते चले गए थे जब बाबू ने घर छोड़कर या तो गुरू के या गुरू के किसी चेले के साथ रहना शुरू कर दिया था. जैसा कि मुझे बाद में मालूम चला, चूंकि मौसी बाबू के आध्यात्मिक उद्देश्यों की प्राप्ति की राह में रोड़ा बन गई थी, बाबू ने संसार को त्याग कर गुरू के चरणों में सन्यासी जीवन बिताने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था.

(जारी)

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

छात्रावास का जीवन जहाँ एक ओर उत्श्रंखल होता है वहीं दूसरी ओर अपने बारे में बहुत कुछ जानने को मिल जाता है।

VICHAAR SHOONYA said...

कुंवर साहब के जीवन में जो घटा मैं उस पर कोई टीका टिप्पणी ना करके सिर्फ उनकी आत्मकथा को पढना चाहता हूँ. टिप्पणी तो सिर्फ इस लिए करता हूँ कि कहीं टिप्पणी के आभाव में यह लेख श्रंखला बीच में ही ख़त्म ना हो जाय. अब आगे कि कथा कहें....

मुनीश ( munish ) said...

hmmm...!agey...?

काकेश said...

सही है। पढ़ रहे हैं।