Sunday, January 15, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - ग्यारह


(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग ग्यारह

हरुवा भन्चक के एक स्टेटमेंट ने हमें सन्नाटे में डाल दिया था. इतनी आसान भाषा में इसके पहले मानव इतिहास में आशिकों को शायद ही कभी वर्गीकृत किया गया होगा. मिनट भर के भीतर परमौत की समझ में दो बातें आ गईं - पहली कि मोहब्बत एक ऐसी चीज़ का नाम है जिससे कोई भी अछूता नहीं  रह सकता. हरुवा जैसा घोषित निखट्टू और भन्चक चचा भी नहीं. दूसरी यह कि उसे पिरिया के साथ चल रहे अपने चक्कर को किसी भी निर्णायक बिंदु तक पहुंचाने के लिए उसे अपनी भूमिका छांट लेना होगी - पतंगा या भौंरा.

अपने घायल पैर को श्रमपूर्वक दूसरी तरफ रखकर हरुवा भन्चक ने कराहते हुए करवट बदली और कहना शुरू किया - "पतंगा टाइप इज ऑफ़ दी डैथ एंड भौंरा टाइप इज दी इन्जॉय ऑफ़ ए लाइफ. माई डीयर नब्बू डीयर प्लीज़ डोन्ट कन्फयूजिंग माई भतीजा विद दिस फुकसट नॉनसन. ... "

हरुवा भन्चक के इस असमय प्रत्याशित अंग्रेज़ी हमले ने नब्बू डीयर को ही नहीं हम सब को असमंजस में डाल दिया था. समझ में नहीं आ रहा था कि खुद को किस कैटेगरी में डाला जा सकता था. नब्बू डीयर का केस देखा जाय तो बिना नाम वाली काल्पनिक प्रेमिका चक्कर में मुकेशपीड़ा से ग्रसित हो चुके इस स्वार्थ के पुतले में पतंगा होने के सारे लक्षण मौजूद थे लेकिन तमाम लड़कियों को देखते ही जिस तरह सबसे पहले उसके मुंह से लार टपक जाती थी वह उसकी सतत भौंरावस्था का घोषित मैनिफेस्टो हुआ करता. गिरधारी लम्बू और मैं अभी तक पतंगे नहीं बने थे अलबत्ता एक भौंरे के सारे लक्षण हममें थे. बचा परमौत.

परमौत की मोहब्बत ही असली वाली मोहब्बत थी जिसने बकौल गिरधारी उसे "चूतियों का कप्तान" बना डाला था. पिरिया के प्रति अपने विकट अनुराग के चलते उसने मुटल्ली ससी और उसकी लम्बसखी के प्रेम-प्रस्तावों को तवज्जो न देने का महामानवीय कृत्य भी इन्हीं दिनों किया था जो बताता था कि भौंरा बनना उसके नेचर में था ही नहीं और वह पतंगा बनकर शमा के इर्दगिर्द मंडराते हुए अपने विध्वंस की तरफ तीव्रता से अग्रगामी था. यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं थी.

अगले कुछ दिन तक हरुवा भन्चक को हमारे अड्डे पर देखा नहीं गया क्योंकि परकास उसे हल्द्वानी में किसी बिजनेस में सैट कर देना चाहता था. वह क्या कर रहा था न हमें कोई खबर थी न उसमें हमारी कोई दिलचस्पी थी. उस रात उसने मोहब्बत को लेकर हमारे विचारों को सलीके से अलाइन कर दिया था और अब गोदाम में प्रेम की बाबत चलने वाले अधिवेशन शनैः-शनैः समाप्त होते गए. सच तो यह था कि उस रात के बाद हमारा अगला जमावड़ा लगने में हफ्ते से ऊपर का समय लगा.  

इस हफ्ते भर में परमौत ने पहला काम यह किया कि कम्प्यूटर की क्लास में जाना बंद कर दिया. चैंटू सेंटर में हुई उस घटना के बाद वह एक ही दिन क्लास करने गया था. घुसते ही उसने ससी और उसकी दो सखियों को लगातार पलट-पलट कर अपनी तरफ देखते पाया. उसे झेंप लगी. उसे भय लगा कि उसकी चुप्पी को ससी कहीं फ्रेण्डसिप के प्रस्ताव का स्वीकार न समझ ले. पिरिया की तरफ उसने एक बार भी नहीं देखा. हरुवा भन्चक ने घर पर मोहब्बत वाला पाठ उसे अलग से पढ़ा दिया था और "इसमें मिलने वाला कद्दू के टुक्के के अलावे कुछ नहीं परमोदौ" कहकर भरसक प्रिया से दूर रहने की सलाह दे दी थी. फिलहाल एक तरफ़ अभी वह पतंगे की नियति स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखता था वहीं दूसरी तरफ़ अपने अरमानों को ईश्वर के भरोसे छोड़ देने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं दिखाई देता था.

जितना परमौत अपना ध्यान वापस मसालों के धंधे में लगाता, उतनी अधिक उसे विरह-वेदना होती. उसका मन प्रिया की एक झलक देखने का करता होता और सामने रुद्दरपुर के चाट और छोले-भटूरों के ठेलों की लाइन लगी होती. ठेलों के इर्दगिर्द चटोरी स्त्रियों-लड़कियों का सतत मेला लगा हुआ रहता लेकिन उसका मन उनमें से किसी एक की तरफ निगाह डालने का न होता. अपनी कल्पना के पटल पर वह पिरिया को इन्हीं में से एक ठेले पर कुछ खाते हुए देखता. पिरिया पेमेंट करने को पर्स में हाथ डालती और ठेलेवाले उससे "बहिनजी आपके पैसे हो गए" कह रहा होता क्योंकि दूर से यह देख रहे परमौत ने उसे इशारे से ऐसा करने को कह दिया था. असमंजस में पड़ी पिरिया जब ठेलेवाले द्वारा परमौत का सन्दर्भ लिए जाने पर पलटकर देखती - परमौत मोपेड की तरफ देख रहा होता. पिरिया नज़दीक आती और उससे थैंक्यू कहती. वह कहता कि थैंक्यू की क्या बात थी और फिर वे किसी बात पर मुस्कराने लगते. उफ़! कितनी अच्छी लगती है जब हंसती है पिरिया. उसके बाद वह उसे मोपेड पर बिठाकर हल्द्वानी उसके घर छोड़ने जाता. ... मतलब तीस-पैंतीस किलोमीटर का सफ़र पिरिया के साथ. पिरिया लम्बी उँगलियों वाले अपने सुन्दर मुलायम हाथों से उसकी कमर में कसकर घेरा बनाए बैठी होती. घर पहुंचकर पिरिया उसे चाय पीने को अन्दर बुलाती और दरवाज़े पर लगी घंटी बजाती. इस पॉइंट पर आकर उसका ख्वाब टूट जाता. कभी लम्बू अमिताब दरवाज़ा खोलता तो कभी चैंटू सेंटर वाला मुकेस.  

दिनभर खूब दौड़भाग से थके परमौत की थकन इन दिवास्वप्नों से दूनी हो जाया करती और उसका मन गोदाम जाने का भी नहीं होता. घर आकर बिस्तर पर लेटते ही पिरिया वाली पिक्चर फिर शुरू हो जाती. पिरिया उसका माथा दबा रही है. पिरिया उसके लिए चाय बना रही है. पिरिया उसकी बगल में लेटी है. मोहब्बत से झिड़कती पिरिया उसे मूंछों को बार-बार सहलाने की गंदी आदत छोड़ने को कह रही है. वह पिरिया के लम्बे बालों पर उंगलियाँ फिरा रहा है जैसे एक पिक्चर में उसने देखा था. फिर वह मनोज कुमार की तरह नदी किनारे एक पत्थर पर फुलवा की जगह पिरिया लिखकर 'चाँद सी मैबूबा' गाने लगता. मालासिन्ना की तरह दांतों में उंगली दबाये पिरिया शर्माने का नाटक करने लगती ... पिरिया! पिरिया! ... क्या मेरी मौत के बाद आएगी तू मेरे पास ... 

ऐसे ही एक रात वह अपना दिल भींचे पिरिया के साथ एक ड्रीम सीक्वेंस में था कि उसकी विचार-श्रृंखला को हरुवा चचा ने "सो गया रे परमोदौ" कहकर भंग किया.

हरुवा भन्चक ठीकठाक टैट होकर आया था. परकास ने उसे पुश्तैनी दूकान में मुनीमगीरी का काम सीखने में लगा दिया था. उसने मुनीमगीरी अच्छे से सीखनी शुरू कर दी थी जिसका प्रमाण यह था कि उसने तीसरे ही दिन से गल्ले पर इतना हाथ साफ़ करने के कला में निपुणता हासिल कर ली थी कि शाम का कोटा खरीदने लायक रकम बन जाए.

"ना बे चचा, सो कौन साला रहा है. दिमाग का मठ्ठा बना पड़ा है यार. तू बता कहाँ से आ रहा है कीटा फाइट करके ..." हल्द्वानी के रचनात्मक मद्यपों द्वारा दारु पार्टी के पर्यायवाची के तौर पर प्रचलन में लाये गए अनेक मुहावरों में से हरुवा भन्चक के सबसे प्रिय मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए परमौत ने अपने दिमागखाऊ चचा की नैसर्गिक प्रतिभा को सुलगाने का काम किया.

"तेरे हल्द्वानी वालों के बस की जो क्या होने वाली ठैरी साली कीटा फाइट ... उसके लिए तो हमारे वहां के खड़क दा, फतेसिंग हौलदार और गबरसिंग मास्साब जैसे बफौले चइये होने वाले हुए. तब होने वाली ठैरी असली कीटा फाइट साली. अभी परसों हौलदार साब के यहाँ उनके भतीजे का नामकन्द था. दो तो मारे बकरे और अट्ठार आई रही घोड़िया रम की बोतल. सुबे से लग गए ठैरे हम काटने-हाटने में. अरे भुटुवा गजब बनाने वाले हुए गबरसिंग मास्साब. अब वो बना रहे ठैरे भुटुवा और क्या नाम कहते हैं खड़क दा बना रहे ठैरे दारू के पैक. इतने में साला पारभिड़े का हरकुवा आ पड़ा वहां. मैंने सोचा आया होगा वो भी न्यौते में. पारभिड़े वाले भी फतेसिंग ज्यू के रिश्तेदारी में आने वाले ठैरे लेकिन पराड़के साल हमारे यहाँ से एक एक बरात गयी रही उनके वहां. खाना-हाना खाने में थोड़ी देर हो पड़ी और जब गरम रोटी नहीं मिली तो फतेसिंग जी वहां के चार-पांच लौंडों को फतोड़ आये ठैरे. एक तो उनका साला भी लगने वाला हुआ. तब से ज़रा हमारी इधर को कम आनेवाले हुए पारभिड़े के लोग ... परमोदौ तेरे पास कुछ धरा है माल-फाल यार? तीस लग री जरा ..." किस्से को क्षणिक विराम देकर हरुवा भन्चक ने शेष बची रात के लिए व्यक्तिगत मौज की संभावनाएं तलाशना शुरू किया.

"मेरे पास कहाँ से आई यार चचा. मैं घर में रखता नहीं तू जानने वाला हुआ. ऐसी तीस लग रई थी तो पैले से जुगाड़ कर के लाना चाइये था. अब ये आधी रात तेरे लिए दारू कहाँ से लाऊँ मैं ..."

अभी आधी रात नहीं हुई थी और परमौत जैसे काबिल भतीजे की इस बात से हरुवा भन्चक उखड़ गया.

"बड़ा साला रईस बनता है ... अभी इग्यारा भी नहीं बजे और तू ऐसे पौंक रहा है. चल मेरे साथ चल मैं दिखाता हूँ कां मिलेगी साली दारु तेरी हल्द्वानी में ... चल यार मेरा कोटा पूरा नहीं हुआ अभी ..."

परमौत के पास बिस्तर से उठकर हरुवा के साथ बाजार की राह लगने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं था. इसके अलावा खुद इतने दिनों से घर पर शामें बिताने की वजह से वह खुद ऐसे किसी एडवेन्चरनुमा बहाने की तलाश में था.

चचा-भतीजा रोड पर थे और नए उत्साह से ठुंसा हरुवा रौ में आ चुका था - "... त्तो हरकुवा को देखा तो फतेसिंग पर तो जैसे द्यप्ता आ गया. कैने लगे इन साले पारभिड़े वालों की हिम्मत देखो बिना न्यौते के हमारे गौं का माहौल खराब करने आ गए. खैर मैंने जैसे-तैसे उनको सांत कराया कि चचा नामकन्द के सुभ दिन किसी से लड़ाई करने का क्या फायदा हुआ करके और हरकुवा को अपनी बगल में बैठा लिया. तब जा के उसने बताया कि दिदी ने जिठानी ने ग्वेल द्यप्ता की कसम खिलाई हुई कि इस नामकन्द में जरूड़ी आना हुआ तुझको. दो चार पैक खींच के फतेसिंग भी राजा सिवी बन गए हुए. कैने लग गए और पिलाओ इस हरकुवा को. जो भी हुआ सालिगराम ठैरा हमारा. तो साब ... टैंकर होने हुए ये साले पारभिड़िये ... आधी बोतल ऐसेई हड़का जाने वाले हुए. बोतल-होतल, बकरा-हकरा साम तक सब्ब निबट गया तो खड़कदा तास की गड्डी निकाल लाया कहा ..."

ठेका आने को था और दूर से देखा जा सकता था कि वह बंद था. खबर हरुवा भन्चक अपनी शौर्यगाथा चालू रखे हुए था - " पारभिड़िये ऐसे हुए परमोदौ मल्लब समझ ले कि दहलपकड़ और सीप में उनको कोई नहीं हरा सकने वाला हुआ. तो खड़कदा ने ग्वांक्क जैसा करते हुए कहा कि पारभिड़े वालों में है हिम्मत तो सीप में हरा के दिखाओ सालो. अब पारभिड़े वाला वहां ठैरा कौन हरकुवा के अलावा. लौंडा ही हुआ बिचारा. पी-पा के टोटिल हुआ रहा एक कोने में. धो-धो करके साले को उठा-उठू के होस में जैसा लाये और कहा कि सीप खेल खड़कदा के संग ..."

परमौत ने ठेके के बंद शेयर शटर के बगल में लगे एक गुप्त बिंदु पर लगी घंटी बजाई तो शटर में से एक झिरी जैसी खुली और "क्या चाइये" की आवाज़ के साथ एक हथेली बाहर आई. परमौत ने कुछ नोट उस हथेली पर रखे और बीस सेकेण्ड के भीतर रम की एक पूरी बोतल उसके हाथ में थमा दी गयी. झिरी बंद हो गयी. अपना किस्सा रोक कर हरुवा भन्चक ने इस चमत्कार को देखा और अंग्रेज़ी मुहावरे में कहा जाय तो उसका जबड़ा नीचे गिर गया.

"गजब हुई साली हल्द्वानी यार परमोदौ. गजब्बी कहा ..."

बोतल हाथ में आते ही पीने के सुरक्षित अड्डे के नाम पर परमौत के गोदाम की याद आई और वे उसी दिशा में चल पड़े.

"हाँ चचा फिर बता क्या कै रा था तू ... क्या हुआ पारभिड़े वाले का?"

"हाँ हाँ ... फीर क्या हुआ कि परमोदौ लला उस साले छटांक भर के लौंडे ने एक के बाद एक तीन गेम पेल दिया खड़कदा को. दस-दस रुपये का एक गेम ठैरा. एक-एक गेम फतेसिंग हौलदार और गबरसिंग मास्साब ने भी हार दिया हुआ तब जा के खड़कदा ने मुझसे कहा कि हरुवा तू खेल एक हाथ इस साले के साथ. अब हमारा गेम चल रा हुआ और उस साले को लग गयी पिसाब. उसके हो रहे ठैरे बहत्तर पॉइंट और मेरे निल. जीतता तो मैं क्या ही ठैरा, मैंने लौंडे के गए हुए में जरा बेमांटी कर दी और हुकुम का बाश्शा छिपा के जेब में रख लिया. फतेसिंग हौलदार तीस रूपये हार के झंड जैसे हो रहे ठैरे तो अन्दर से दो घोड़िया बोतल और निकाल लाये और सबके लिए पैक बना दिए. लौंडा आया तो पत्ते बांटने लगा. पत्ते पूरे हुए ही नहीं ... कहाँ से होते ... मैं भी महीन-महीन हंस रहा ठैरा कि बेटा अब हरा के दिखा कन्नल हरीस चन को ... बहुत ढूंढ-ढांड के भी पत्ता नहीं मिला तो लौंडा बोलने लग गया कि तुम सब मिल के बेमांटी कर रहे हो कर के. उसने ऐसा कहना था और मारी साले के भेल में गबरसिंग मास्साब ने कि बेमांटी करते होंगे पारभिड़े वाले कि इकावन पत्तों वाली गड्डी से पांच बाजी जीत दीं. उसके बाद तो क्या खड़क दा, क्या फतेसिंह और क्या मैं ... हमने साले को आधी रात तक मुर्गा बना के बाहर खड़े करा दिया बाहर अरड़पट्ट में  ... उसके बाद जब तक उसने जीते हुए पैसे वापिस नहीं करे साले को जाने नहीं दिया ... उसके बाद जैसे ही जरा हमारी नजर इधर-उधर हुई वो बिचारा वापिस अपने घर को भाग गया रहा ... उसके बाद भतीजे क्या हुआ ... "

हरुवा ने परमौत की तरफ निगाह डालकर अपनी क़िस्सागोई के प्रति भतीजे का रेस्पोंस देखने का प्रयास किया. परमौत ने इस बात को ताड़ लिया और ठहरकर बोला - "तू बोर बहुत करनेवाला हुआ चचा यार. तीसरी बार सुना रहा है ये चूतियापन्थी का किस्सा तू ... ज़रा बोतल थाम तो देखूं चाबी कहाँ रखी है साली." वे गोदाम के बाहर खड़े थे. चारों तरफ वीरानी सी थी और कूड़े के ढेर पर बैठने वाले पुरातन लुरिया कुत्ते के अलावा जीवन का कहीं कोई लक्षण दिखाई नहीं देता था. नब्बू डीयर उस रात गोदाम की चाभी अड्डे पर रखना भूल उसे अपने साथ ले कर चला गया था. काफी देर अँधेरे में टटोलने पर जब चाभी नहीं मिली तो परमौत ने हरुवा चचा को वहीं खड़ा रहकर इंतज़ार करने को कहा और गोदाम के बगल वाली गली में घुस गया जहां गिरधारी लम्बू का घर था. भतीजे द्वारा हाल ही में अपमानित किये गए हरुवा भन्चक ने हाथ में धरी बोतल खोल ली और दो बड़े बड़े नीट घूँट गटककर बाकी का किस्सा कूड़े की बगल में बैठकर कुत्ते को सुनाना शुरू किया. अजनबी को इस तरह का व्यवहार करता देख कुत्ता सावधान हुआ और उसने अर्ध-गुर्राहट के साथ 'हू... हू...' शुरू कर दी. इस से हरुवा भन्चक हकबका गया और 'हट हट' करता खड़ा होने का प्रयास करने ही लगा था कि गली के भीतर से परमौत और गिरधारी लम्बू नमूदार हुए.


(जारी)    

Friday, January 13, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - दस

फ़ोटो http://www.uttaranchal.org.uk से साभार 

(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग दस

लाईट जाते ही नब्बू डीयर बोला - "लाईट चली गयी". अँधेरे में आसपास से गुज़र रहे तीन-चार त्रिकालदर्शी महात्माओं ने भी कहा "लाईट चली गयी". इन सभी के तीसरे नेत्र खुल चुके थे और ये लाईट जाते ही जान जाते थे कि लाईट चली गयी है और आम जनता को इसकी सूचना देना अपना कर्तव्य समझते थे.

"हल्द्वानी वालों को पता भी तो लगना चाहिए कि शहर में भन्चक आ गया है. अब तुम लोग यहाँ से फूट लो वरना चचा तुम्हें इतना चाटेगा कि तुम्हारे दिमाग की खाल उतर जाएगी ..."

आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा बनती इसके पहले ही मंदिर के गेट की तरफ से "ओईजा ... ओ बाज्यू ... मार दिया सालों ने रे ... मर गया रे परमौत मैं ... मर गया रे ..." की हरुवा भन्चक की दर्दभरी पुकार उठी. हम उसी तरफ को भागे - कोई जाकर एक पेट्रोमैक्स ले आया था जिसकी मरी हुई भकभक रोशनी में हमें दिखाई दिया कि परमौत के चचा ज़मीन पर गिरे हुए थे. उनके ऊपर क्रमशः एक स्कूटर, एक मोटा व्यक्ति, एक नौकरनुमा छोकरा और बर्फी की दो ट्रे स्थापित थे. इनमें जो जंगम थे उस के मुखमंडलों हाल में घटे एक्सीडेंट और उसके बाद की बेतरतीब और नासमझ बदहवासी विराजमान थी. स्थावरों का भूसा भरा हुआ था - स्कूटर का पिछ्ला पहिया अब भी घूम रहा था, उसकी हैडलाईट लटक कर बाहर आ चुकी थी और घटनास्थल पर बर्फी बिखर गयी थी जिसके लालच में इतनी देर में उम्मीद में पूंछ हिलाते, जीभ बाहर निकाले दो कुत्ते भी आ गए थे. हरुवा भन्चक अर्थात परमौत के चचा का हाल सबसे खराब दिख रहा था और उन्हें तुरंत बाहर निकाला जाना आवश्यक था.

ऐसे मौकों पर आ जाने वाले दर्ज़नों लोग वहां खड़े हुए तमाशा देखने का राष्ट्रीय धर्म निभा रहे थे.

"हटो पैन्चो ... सब हटो सालो ..." कहते हुए गिरधारी लम्बू ने कमान सम्हाली और हरुवा चचा को बाइज्ज़त बाहर निकालकर खड़ा करने की कोशिश की. "खुट टुट गो ... खुट टुट गो ..." अर्थात मेरा पैर टूट गया है दोहराते हुए वे बार-बार नीचे बैठ जा रहे थे.

दर्द से कराहते हरुवा भन्चक की एक चप्पल घटनास्थल से नदारद थी और चप्पलविहीन पाँव से खून निकल रहा था. मैंने और परमौत ने उसकी बगल में बैठकर चोट का संक्षिप्त मुआयना किया और फ़ैसला किया कि चचा को जल्दी से पहले अस्पताल पहुंचाया जाना होगा. इतनी देर में परमौत एक दफ़ा चचा को घर पर ही बैठ कर उसका इंतज़ार न करने और यहाँ आकर अपनी ऐसी-तैसी कराने के चक्कर में थोड़ी सी डांट भी पिला चुका था.

स्कूटर वाला इस बीच में नदारद हो चुका था. कोई भला आदमी एक रिक्शा बुला लाया. हरुवा भन्चक को जस-तस उस में लादा गया. नब्बू डीयर ने झटपट सीट झपट ली और चचा का सर अपनी गोदी में रख कर दिखावटी स्वयंसेवक-कम-अभिभावक बन गया. परमौत ने पैरों वाली जगह पर लगी जुगाड़ बच्चा सीट खोल ली और उसमें बैठ गया. रिक्शा चला तो हरुवा भन्चक ने ऐसी कराह निकाली जैसे उसकी शवयात्रा निकल रही हो. उसी अंदाज़ में भीड़ ने हुतात्मा वाहन को विदाई भी दी. "बच्चों की तरे डुडाट पाड़ना बंद कर यार चचा." - परमौत अपने तकरीबन हमउम्र चचा से तू-तड़ाक में ही बोलता था.

इस तरह दस मिनट के भीतर ही सुख की अनुभूति से परम झन्डावस्था को प्राप्त होकर, जीवन और मौज की क्षणभंगुरता पर  विचार करते, दार्शनिक मुखमुद्रा बनाए गिरधारी लम्बू और मैं पीछे-पीछे आने लगे. सतनारायण मंदिर से अस्पताल करीब एक मील की दूरी पर था. इसमें थोड़ी चढ़ाई भी पड़ती थी. रिक्शेवाला विकट तरीके से मरगिल्ला था और इतना बोझा खेंचने उसके बस का नहीं दीखता था. इसके बावजूद परमौत रिक्शे से नहीं उतरा. नब्बू डीयर से ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ था. मेन रोड तक जस-तस पहुँचने के बाद रिक्शे ने रफ़्तार पकड़ी और हमने पीछे रहकर आराम आराम से चलना बेहतर समझा.

गिरधारी झींक रहा था - "सीजन की पहली शादी में ऐसी भन्चक लग गयी साली. एक्क लौंडिया भी ना देख पाए यार पंडित. दारू उतर गयी नफे में ..."

दारू का नाम सुनते ही ख़याल आया कि बाईं तरफ को हल्का सा दिशापरिवर्तन करके हम लोग ठेके पहुँच एक पव्वा समझ सकते थे और यही हमने किया भी. आसपास मच्छी की पकौड़ी तली जा रही हो तो पव्वे को खाली झाड़ लेना पाप होता है - वर्षों में  अर्जित किये गए इस ज्ञान के प्रभाव में हमने मच्छी के ठेले पर ही छोटी-मोटी पाल्टी जमा ली. ठेलेवाला परिचित था और उसने " आज रामनगर से रोहू आई है साब" कहकर हमें आधी की बजाय फुल प्लेट मच्छी सूतने को विवश किया. अस्पताल पहुँचने की हड़बड़ी और अकेले मौज काट लेने से पैदा हुए अपराधबोध के कारण जल्दी-जल्दी गटकी गयी दारू ने अपना असर दिखाया और गिरधारी लम्बू ने मच्छी वाले को बचे हुए पैसे रख लेने को कहते हुए एक मिनट की शहंशाही लूट ली. हम लहराते हुए अस्पताल को मुड़ने वाले चौराहे पर पहुंचे तो देखा थोड़ी भीड़ लगी हुई है. बगल से त्रिनेत्रधारी कुछेक और धर्मात्मागण 'कोई एक्सीडेंट हो गया है' कहते हुए अपने राजमहलों की तरफ़ जा रहे थे. उनके थैलों में सब्जियों के नाम पर कद्दू और लौकी जैसे कलंक लदे हुए थे और वे 'सिबौ सिब' अर्थात 'हे भगवान ... बिचारे ... च्च्च्च ...' का जाप करते हुए परमपिता का धन्यवाद कर रहे थे जिसने उन्हें इस एक्सीडेंट में भी कोई रोल नहीं दिया था.

मोड़ काटने के चक्कर में रिक्शेवाले से न तो झोंक ही सम्हल सकी थी न ही सवारियों का बोझ. फलस्वरूप वह चकरघिन्नी खाता हुआ पलट गया था. एक्सीडेंट की बाबत इतनी जानकारी हमें बिना किसी से पूछे मिल गयी थी. घटनास्थल पर पहुंचे तो पाया कि नब्बू डीयर और परमौत अपने-अपने हाथ-पैरों का मुआयना करते हुए उठने की कोशिश कर रहे थे जबकि भन्चक चचा और भी घायल होकर रोड इस मुद्रा लंबायमान पड़े थे जैसे उन्हें अब चिता पर लिटा दिया गया हो और माचिस भर लगाने की देर हो. दिहाड़ी मारी जाने की आसन्न संभावना से निराश दिख रहा मरियल रिक्शे वाला अपनी कोहनी थामे कभी अपने रिक्शे को देखता कभी भीड़ को.

रेस्क्यू ऑपरेशन नंबर दो के लिए एक हाथठेले की सेवाएं ली गईं. हरुवा भन्चक और नब्बू डीयर ठेले पर आलू के बोरों की तरह लादे गए और परमौत ने हमारे कन्धों का सहारा ले लिया. परमौत ने ही हाथ के इशारे से रिक्शेवाले को भी अपने पीछे पीछे अस्पताल आने को कहा. सरकारी अस्पताल में न डाक्टर मौजूद था न कोई नर्स. एक वार्डबॉय-कम-कम्पाउन्डर ने बड़े क्रूर तरीके से बेकाबू कराहते-रोते हरुवा भन्चक के चोटिल पैर को मोड़-माड़ कर देखा और "टूट भी सकने वाला हुआ, नहीं भी टूटा होगा क्या पता ... " कहकर बेतरतीब पट्टी बांधी. नब्बू डीयर और परमौत की चोटों को पट्टी बांधे जाने लायक भी नहीं समझा गया. नौ-साढ़े नौ बजे हम पांच लोग अस्पताल से बाहर निकल सके. इस तरह अपने हल्द्वानी-आगमन के दो घंटों के भीतर ही हरुवा चचा ने अपने व्यक्तित्व और ग्रहों के प्रताप से हमारी ज़िंदगी और नगर की बिजली पर डबुल भन्चक लगा दी थी. "ओईजा ... ओबाज्यू" अर्थात 'हे मातुपिता' करता हमारे साथ लंगड़ा कर चलता हुआ हरुवा भन्चक बेहद दयनीय लग रहा था और हमें उसके लिए रिक्शा करना चाहिए था पर हमने वैसा नहीं किया.

उसके दोनों पैरों में चप्पलें नहीं थीं. गिरधारी लम्बू ने जब इस बात का ज़िक्र किया तो अक्सर ज़रुरत से ज़्यादा सिपला बनने  वाले नब्बू डीयर ने अपनी जेब से एक चप्पल निकालते हुए शाबासी पाने की उम्मीद में कहा - "चौराहे पर रिक्शा जैसेई पलटा ना तो चचा की चप्पल निकल गयी रही. मैंने कहा नबुवा अपनी चोट की क्या है, चप्पल नहीं खोनी चइये, बाकी  चाए कुछ हो जाए. समाल ली थी मैंने ..."

"दूसरी कां है?" परमौत ने बिना ज़्यादा दिलचस्पी दिखाए पूछा.

"मुझे क्या पता. अपने चचा से पूछ परमौद्दा ..."

"दूसरी पैले ई हरा आया हुआ चचा सतनारायण में ... अब इस दूसरी वाली को भांग में डालके चार दिन घर के बाहर गाड़ देना. पांचवें दिन नई जोड़ी निकलने वाली हुई बल ..." नब्बू डीयर की मज़ाक बननी शुरू हुई तो हम सब अपनी रंगत में आने लगे. हरुवा भन्चक भी नवोत्साहपूरित होता दिखने लगा था और अपने प्रिय भतीजे-कम-सखा से कह रहा था - "परमोदौ ... तीस जैसी लग रई हुई यार ... तुम लौंडे तो साले दो घंटे से भबक रे हो ... कुछ हो जाता जरा ..."   

हरुवा चचा के आग्रह के बाद "अब आगे क्या करना है?" की निगाह एक-दूसरे पर डालने के उपरान्त हमने कोटा खरीद कर पहले एक निगाह सतनारायण मंदिर जाकर डालने का निर्णय लिया - हो सकता है किसी भी तरह का कुछ माल वहां अब भी बचा हो!

माल समझकर हमने तीन रिक्शे कर लिए. अड्डे पर पहुंचकर एक चोर निगाह एट-होम के वेन्यू पर डाली तो पाया कि खाना निबट चुका था और भीतर बेशुमार कागज़-प्लास्टिक की प्लेटें और गिलासेत्यादि बिखरे हुए थे. एक कोने में दूल्हा-दुल्हन और उनके परिवारों के लोग इकठ्ठा होकर लगभग अंतिम अधिवेशन में संलग्न दिख रहे थे. बिना दुबारा सोचे तुरंत गोदाम जाने का फैसला किया गया. दुल्हन बनी फूलन और उसकी बगल में खड़े अपने नगर के गौरव और अब 'मोहब्बत का मसीहा' कहलाये जाने वाले गणिया छविराम को साथ फोटू खिंचाते देखने का हमारा कितना मन था लेकिन वह हमारे भाग्य में बदा न था.

पहले यह तय हुआ कि एक बोतल में सैट करा कर हरुवा चचा को घर पर नत्थी कर आया जाएगा लेकिन वहां भाई-भाभी का सामना हो जाने का खतरा था. परकास की कर्री अनुशासनप्रियता के चलते हरुवा भन्चक को भी उससे डर लगता था.

खैर. एक बोतल के बाद समां जैसा बंध गया. हरुवा का कराहना बंद हो गया था और उसे कोने वाले बिस्तर पर लधर जाने को कह दिया गया. दूसरी बोतल के आधा निबटने तक उसने बाकायदा हलके हलके खर्राटे भी निकालने शुरू कर दिए थे. लाईट न होने के वजह से बहुत साफ़ साफ़ तो नहीं देखा जा सकता था लेकिन लग रहा था कि वह सो चुका.

"कैसी चल्ली परमौद्दा लैला-मजनू वाली पिक्चर कहा" नब्बू डीयर ने परमौत को साधिकार छेड़ते हुए पूछा.

"सई चल्ली नबदा. तुमने बताया रहा कि डरना नईं हुआ किसी से तो परमोद ने डरना छोड़ दिया ठैरा सबसे. सई चल्ला ... सब्ब सई चल्ला ..."

"कुछ बात-हात चलाई मेरी ... वो मोटी वाली से ... क्या नाम कै रा था तू ... उस से ... मल्लब ..."

"तू भी यार नबदा हुआ साला एक नंबर हरामी. ये नईं कि साला परमोद जिंदा कैसे है. साले की ज़िन्दगी नरक हो गयी पिरिया के बिना. उससे मिला या नहीं तो पूछ नहीं रहा अपने चक्कर में लगा हुआ ... अरे पैले मेरा होने दे तेरा भी हो जाएगा ... क्या कैने वाले हुए मुकेस गुरु तेरे कि भगवान के घर ..."

परमौत और नब्बू का शास्त्रार्थ शुरू हो चुका था. इस की बारम्बारता और मनहूसपंथी से चट चुके गिरधारी और मैं हाँ-हूँ करते और कोटा समझते जाते. पता नहीं कब दोनों विद्वज्जनों का शास्त्रार्थ एक दूसरे की काल्पनिक प्रेमिकाओं और उनके काल्पनिक मिलन की सतही बातों से होता हुआ प्रेम यानी इश्क़ यानी मोहब्बत यानी आशिकी की परिभाषा और प्रकार जैसे तकनीकी विषय पर पहुँच गया था.

"प्यार का मतलब होने वाला हुआ लभ - एल ओ भी ई - लभ - और लभ जिससे होने वाला हुआ उसे कैने वाले हुए लभर. और जो तुमारा लभर हुआ उसके साथ तुमारे लभ के बाद तुम वो हो जाने वाले हुए और वो तुम हो जाने वाला हुआ ...  आई समझ में ... मल्लब दो बॉडी होने वाली हुई लेकिन लाइफ उस में ठैरी एकी. एक को पत्थर मारो तो साली दूसरे की नकसीर फूट जाने वाली हुई ... मुकेस गुरु का गाना भी हुआ ऐसे में कि जिन्दगी और कुछ बी नईं  तेरी-मेरी कहानी हुई बस ..." - नब्बू डीयर की फिलॉसफी की क्लास चालू थी.

परमौत ने निरंतरता बनाए रखने की गरज से पूछ लिया - "जब दो लोग एक हो जाने वाले हुए नबदा यार तो फिर सादी का क्या मल्लब हुआ? सादी करने की जरूअत ही क्या हुई साली..."

"ल्ले! इसमें तो एक गाना कै गए हुए उस्ताज .... " कहकर नब्बू डीयर ने अपनी पतली सी मरियल आवाज़ में पहले तो थोड़ा सा "हुँ हुँ" किया, उसके बात बाकायदगी से मिमियाना शुरू कर दिया -

            अरिमां किसिको जन्नति की रंगी गलियों का
            मुजिको तेरा दामनि है बिस्तरि कलियों का
            जहाँ परि हैं तेरी बाहें, मेरी जन्नति भी वईं  है"

गला खंखार कर उसने संदर्भ और व्याख्या शुरू कर दी - "मल्लब कि लभर को फूल पत्ती जो क्या चैये ठैरी - उस बिचारे को तो अपने लभर की बांह में लेट के मर जाने का मन होने वाला हुआ ... और मुकेस गुरु कैने वाले हुए कि मेरे जैसे तो लाखों  हुए लेकिन मेरे मैबूब जैसा जो क्या कोई ठैरा ... तबी तो मैं कैता हूँ ... "

"बस लेट के मर ही जाना हुआ तो साला दारू पी के मरना ज़्यादा ठीक हुआ. है नहीं? और साला बांह में लेट के मरने  को जो चूतिया करता होगा सादी ... सादी तो यार परमौद्दा उस के ई चक्कर में करने वाले हुए सब .... मल्लब उसके ...." शास्त्रार्थ में अश्लीलता फैलाने के उद्देश्य से गिरधारी लम्बू में दो उंगलियाँ टेढ़ी कर के परिचित निशान बनाया.

परमौत इस व्यवधान से उखड़ने ही वाला था कि कोने से हरुवा भन्चक ने, जिसे हम सो चुका समझ रहे थे, बोलना शुरू किया - "तुम शब शाला ब्लैडी गंवाड़ी मैन ... लभ के बारे में क्या जानता ... जितना जानता जानता लेकिन कन्नल हरीस चन्न के बराबर नईं जानता ..." परमौत के हवाले से हमें ज्ञान था कि मदिरा के अतिरेक में हरुवा भन्चक के भीतर फ़ौज के कर्नल की आत्मा आ जाया करती थी और वह अंग्रेज़ी में बोलने लगता.

"लभ मल्लब आई एम टैलिंग यू मिस्टर परमोड एंड मिस्टर गिरढारी - आर यू ए पतंगा ऑर ए भौंरा?"

जिसे हमने मरा हुआ जान लिया था वह कब से हमारी बातें सुनकर हमें गधा समझे हुए था और बाकायदा चैलेन्ज कर रहा था - "पतंगा या कि भौंरा?"

परमौत कभी अपने चचा-कम-सखा को देखता, कभी मित्रमंडली को.

"माई डीयर भतीजा. आई एम ए टैलिंग यूवर ब्लैडी फुकसट दोस्त्स दी मोस्ट भैन्कर सीक्रेट ऑफ़ दी इन्डियन आर्मी एज़ दी लभ." अब भन्चक ने गुरु का आसन ग्रहण कर लिया था -

"लभ इज दी टाइप ऑफ़ ए टू - वन इज ऑफ़ दी पतंगा टाइप एंड वन इज ऑफ़ दी भौंरा टाइप ..."    

(जारी)

Thursday, January 12, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - नौ


(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग नौ 

एक होते थे हरुवा भन्चक. पहाड़ की शैली में कहा जाए तो इस कहानी में उनका प्रवेश करना अब मस्ट हो गया था.

हरुवा भन्चक का असली नाम हरीश कुछ था लेकिन यह ख़िताब उन्हें उनके समकालीनों ने तब दे दिया गया था जब वे कुल जमा बारह साल के हुए थे. उस साल स्कूल में स्वतंत्रता दिवस के दिन फहराने तो झंडा तैयार करने का जिम्मा उन्हें मिला था क्योंकि वे स्काउट टीम के कप्तान बना दिए थे. देश-प्रदेश के अन्य सरकारी स्कूलों की तरह इस स्कूल में भी स्काउट-गाइड का एक मास्टर होता था जो सबसे निखिद्द और हौकलेट माने जाने वाले कार्यों के प्रतिपादन और यदा-कदा अरेंजमेंट मास्टरी लिए नियुक्त किया जाता था और उक्त स्कूल के उक्त मास्टर हरुवा के मामा हुआ करते थे. ज़ाहिर है कप्तान हरुवा ने बनना था.

तो साहब तीन दिन तक मामाजी ने हरुवा को झंडा तैयार करने की रिहर्सल करवाई लेकिन ऐन स्वतंत्रता दिवस के दिन मास्साब अपने काबिल भांजे के दिशानिर्देशन के लिए उपलब्ध नहीं हो सके अर्थात उन्हें अपने मकोट हो रहे एक निकट संबंधी का पीपलपानी अटैंड करने के चक्कर में छुट्टी जाना पड़ गया था. मामाजी द्वारा करवाए गए अभ्यास की बदौलत हरुवा ने झंडे की रस्सी में ऐसी गाँठ बांधी कि प्रिंसिपल साहब के दसियों बार खेंचे जाने पर भी वह नहीं खुला. सारे बच्चे झंडा खुलने और उसके बाद मिलने वाले बूंदी के लड्डुओं की थैली का इंतज़ार कर रहे थे. राष्ट्रध्वज की ऐसी हालत होते देख पूरन चन्द्र उर्फ़ पुरिया गुरु नामक विज्ञान ने मास्टर ने प्रिंसिपल साहब की मदद करने की पेशकश की जिसके मान लिए जाने पर उन्होंने रस्सी को थोड़ा जोर से खींच दिया. झंडा खुला तो नहीं, झटका लगने से उसका दुबला सा बांस बीच से एक कड़ाक के साथ दो हिस्सों में टूट गया. ऊपर का हिस्सा हवा में उड़ा और मय झंडे के प्रिंसिपल की खोपड़ी पर लगा. जब तक वे कुछ प्रतिक्रिया करते, पुरिया गुरु ने चपलता के साथ झंडे को कैच कर लिए और देश का अपमान होने से बचा लिया. करीब दस मिनट तक रस्सी की भयानक तरीके से उलझ गयी गांठों को जब तक पुरिया गुरु सुलझाते और झंडे को फहराने के लिए प्रिंसीपल साहब को हैण्डओवर करते, बाकी मास्टरों ने हरुवा के मामा को अनन्त बार कोसते हुए पर्याप्त मौज काट ली थी. अंततः झंडे को प्रिंसिपल साहब द्वारा हाथ में लेकर इस तरह फहराना पड़ा जैसे जल्दीबाज़ी में  तौलिया सुखा रहे हों.

देश का सम्मान बच जाने के बाद लड्डू वितरण हो रहा था जब एक बच्चे ने, संयोगवश जिसके मामा पुरिया गुरु थे, अपने मामा को बता दिया कि गाँठ असल में स्काउट-गाइड मास्टर बाँध कर नहीं गए थे बल्कि उनके भांजे-कम-शिष्य हरुवा ने बांधी थी. बात प्रिंसिपल साहब तक पहुँची जिन्होंने वहीं खड़े-खड़े फरमान सुनाया कि सजा के तौर पर हरुवा को लड्डू न दिए जाएं. हरुवा वैसे ही शर्म और भय से भरा हुआ था. अपनी नाकामी उजागर हो जाने और दंड मिल जाने से उसे उतनी परेशानी नहीं हुई जितनी इस विचार से कि रात को लौटने पर मामाजी उसका क्या हाल बनाएँगे. प्रिंसिपल साहब लड्डू सूत रहे थे, पुरिया गुरु और सारे मास्टर लड्डू सूत रहे थे, चपरासी और तमाम बच्चे लड्डू सूत रहे थे - बस लड्डूहीन हरुवा ही धरती से निगाहें चिपकाए था. प्रिंसिपल साहब ने अचानक उसे अपने पास बुलाया और दो बढ़िया थप्पड़ रसीद करने के उपरान्त स्टाफ का मनोरंजन करते हुए कहा - "भन्चक है साला अपने मामू की तरह." ज़ाहिर है सारा स्टाफ हंसा. खुलकर हंसा और हरुवा को असह्य ग्लानि का अनुभव हुआ.

भन्चक कुमाऊँ में प्रचलित एक शब्द है जिसका अर्थ हरुवा को नहीं आता था. किसी भी तरह के शुभ या आवश्यक कार्य के संपन्न होने में आ जाने वाली अप्रत्याशित बाधा के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता है. इसे भन्चक लगाना कहते हैं. यदि यह बाधा सीधे सीधे किसी व्यक्ति के कारण उत्पन्न हुई हो तो उसे इस उपाधि से लाद दिया जाता है कि फलां आदमी तो भन्चक हुआ.

प्रिंसिपल साहब का आशय भी इसी बात से था कि हरुवा के मामा अर्थात स्काउट-गाइड मास्साब को जो भी काम सौंपा जाय वह कभी पूरा नहीं हो सकता चाहे उसमें भगवान भी अपनी पूरी ताकत लगा दें. गाँव में प्रचलित लोकगाथाएं बताती थीं कि एक साल हरुवा के मामा को आठवीं के बोर्ड इम्तहान की मैथ्स की कापियों का गट्ठर अल्मोड़ा पहुंचाने की ड्यूटी मिली. कापियों को अगले दिन शाम के पांच बजे तक अल्मोड़ा दफ्तर में जमा कराया जाना अनिवार्य था. प्रिंसिपल साहब जानते थे कि कार्य समय पर न हो सकने की स्थिति में उनकी नौकरी भी खतरे में आ सकती है सो उन्होंने इस काम के लिए हरुवा के मामा को ज़िम्मा सौंपा जिसके पास और कोई काम नहीं था. अल्मोड़े पहुँचने के लिए पहले गाँव से पांच किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य मार्ग तक पहुंचना होता था जहाँ द्वाराहाट से रानीखेत जाने वाली वाली केमू की बस पकड़ी जा सकती थी. पहली बस साढ़े सात बजे उनके अड्डे से गुज़रती थी. रानीखेत से अल्मोड़ा जाने को दिन में कोई आधा दर्ज़न केमू और रोडवेज़ की गाड़ियां मिल जाती थीं. गाँव से अल्मोड़े का सफ़र यह सफ़र करीब साढ़े चार-पांच घंटे का माना जाता था. प्रिंसिपल साहब ने हरुवा के मामा को अपनी और उनकी नौकरियों के धार पर लग जाने का हवाला देकर उन्हें इतनी हिदातें दे दी थीं कि वे रात को गलत अलार्म लगा बैठे.

अलार्म लगाए गए समय के मुताबिक़ डेढ़ बजे बजा और वे उसे साढ़े चार मान कर खटाक से उठे. रोशनी करने को मोमबत्ती जलाने को माचिस ढूंढी तो उन्होंने पाया कि माचिस पिछली रात से ख़त्म थी. प्रिसिपल को इस आपदा का ज़िम्मेदार मानते हुए उन्होंने उसे दस बारह मोटी गालियाँ समर्पित कीं और अँधेरे में ही जस-तस नहाने-धोने के पश्चात कर पूजा वगैरह निबटाकर उन्होंने रात की बचाई गयी दो रोटियों को किसी तरह निगलकर नाश्ता समझा और पुनः प्रिसिपल को गालियाँ देते और झींकते हुए गाँव से मुख्य सड़क की पैदल यात्रा पर निकल पड़े. हालांकि वह भूतों के मिलने का समय था लेकिन रास्ते में रहनेवाले किसी भी भूत ने उन्हें परेशान नहीं किया अलबत्ता उनके जूते के तले ने उखड़ना शुरू कर दिया. अँधेरे में वे गलती से पुराना और बदरंग जूता पहन आये थे. उन्होंने फिर प्रिंसिपल का स्मरण किया और किसी तरह तीन-सवा तीन बजे मुख्य मार्ग पर पहुँच गये. ज़ाहिर है चाय का खोखा अभी नहीं खुला था. वहां पर मौजूद श्वान समुदाय ने उनका स्वागत किया जिसका जवाब हरुवा के मामा ने पत्थर-ढेलों और प्रिंसिपल की दिशा में प्रक्षेपित गालियों की सहायता से दिया. अगले दो-ढाई घंटे उन्होंने सर्दी और हैरत में ठिठुरते और बस का इंतज़ार करने में काटे. पौने छः के आसपास जब खोखे वाला ऊंघता हुआ वहां पहुंचा तो मास्साब को देखकर हैरान हुआ. मास्साब को तब तक अलार्म में हुई गड़बड़ी समझ में आ चुकी थी और वे कुछ भी कह सकने की हालत में नहीं थे. झेंपते हुए उन्होंने किसी तरह अपनी शर्म छुपाई और चाय बनाने का आर्डर दिया. उस दिन खोखे में न दूध था न चीनी क्योंकि खोखामालिक पिछली शाम जुए में सारे पैसे हार गया था और अगली सुबह चाय बनाने को दूध-चीनी खरीदने को उसके उसके पास अठन्नी तक नहीं बची थी. हाँ माचिस थी. जीवन में पहली बार हरुवा के मामा ने   इतनी सुबह कड़वी चाय पी. केमू की गाड़ी समय पर आई और जैसे ही वे उसमें चढ़े उनके जूते का तला शेष जूते से पूरी तरह जुदा हो गया और सड़क पर ही रह गया.

हरुवा के मामा की इस अल्मोड़ा यात्रा की तफ़सीलात के अनंत संस्करण अब तक शिक्षा विभाग के उनके समकालीन मास्टरों और चपरासियों के दरम्यान सबसे अधिक सुने-सुनाये गए मनोरंजक किस्से का हिस्सा बन चुके हैं. इन तफसीलों में रानीखेत जा रही बस के टायर का पंक्चर होना, रानीखेत के मोची द्वारा उनके जूते में किये गए अभिनव प्रयोग, अल्मोड़ा जाने को बस का न मिलना, उनका ट्रक पर बैठकर आधे रास्ते कोसी तक जाना, फिर कोसी से पैदल अल्मोड़ा पहुंचना, अल्मोड़े में सम्बंधित दफ्तर का बंद मिलना और कॉपी जमा करवाए जाने के एवज में चपरासी द्वारा बीस रूपये की घूस ऐंठ लिया जाना इत्यादि तत्वों ने इस किंवदंती को जन्म दिया कि स्काउट मास्साब दुनिया के सबसे बड़े भन्चक हैं. हरुवा के मामा को अपनी इस ख्याति की भनक थी लेकिन शांतिप्रिय होने के कारण वे चुपचाप अपनी निठल्ली नौकरी बजाते रहे.

सो उस रात जब वे वापस ठीहे पर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि हरुवा ने सब्जी तक काट कर नहीं रखी थी और वह मुर्दा सूरत बनाए उनकी बाट तक रहा था. उनके आते ही हरुवा ने पूछा - "मामू ये भन्चक क्या होने वाला हुआ?"

पीपलपानी और सफ़र की चिल्लपों से थके हुए मामू ने हरुवा को इतना मारा कि उसकी नाक से खून निकल आया. जब मामला शांत हुआ तो खुट्टल चाकू से आलुओं के छिलके उतारते और अब भी सिसकते हरुवा ने पव्वा खेंचकर निढाल पड़े अपने मामू को अपनी औकात के हिसाब से उलाहना देते हुए कहा - "तुमको भी तो भन्चक बता रहे हुए प्रिन्स्पुल सैप. जो होता होगा साला ठीक तो नहीं होता होगा.  मामू ने कोई जवाब नहीं दिया.

हरुवा को भन्चक का अर्थ जानने के लिए अगले दिन स्कूल पहुँचने का इंतज़ार करना पड़ा जहाँ क्लास में थोड़ा देरी से उसके घुसने पर अक्सर शांत रहनेवाले तारी मास्साब ने उसका खैरमकदम करते हुए "कां रै ग्या था रे भन्चकौ?"

उस दिन के बाद से हरुवा को हर किसी ने हरुवा भन्चक कह कर ही पुकारा. हरुवा ने कालान्तर में नाम के अनुरूप ही महात्मा जैसे कर्म भी किये और उनकी उपलब्धियों को भी इलाके में लोकगाथाओं का दर्ज़ा हासिल हुआ. मसलन वे आटा पिसाने गए तो आटे की चक्की के मालिक का हाथ पट्टे में फंस गया. उन्होंने हाईस्कूल में आर्ट ली तो स्कूल के आर्ट मास्टर ने अपना तबादला करा लिया और अगले दस साल तक वहां किसी आर्ट मास्टर की नियुक्ति नहीं हुई. हरुवा की शादी जिस लड़की से तय की गयी थी वह गाँव में आये रूई धुनने वाले एक बिजनौरी धुनिये के साथ भाग गयी. हरुवा अपनी माँ को इलाज की खातिर हल्द्वानी लेकर आया तो हल्द्वानी में उस दिन डाक्टर हड़ताल पर चले गए.

हरुवा भन्चक और उसके स्काउट मास्टर मामा की कथाओं को यहाँ संक्षेप में बताना इस लिए ज़रूरी था क्योंकि हीरोइन फूलन और गणिया छविराम की शादी वाले दिन हरुवा हल्द्वानी पहुंचा और उसके सतनारायण मंदिर परिसर में घुसते ही लाईट चली गयी और समूचे हल्द्वानी नगर में अगले तीन दिन तक लाईट नहीं आई.  

ऐसे परमप्रतापी हरुवा भन्चक नामक ये महापुरुष परमौत के दूर के रिश्ते के चचा लगते थे और अगले दो सप्ताह हल्द्वानी रहकर परकास के दिशानिर्देश में किसी रोज़गार का संधान करने नीयत से उसके घर जा पहुंचे थे. परमौत की भाभी द्वारा परमौत के व्हेयरअबाउट्स दिए जाने के बाद वे उसकी तलाश में सतनारायण मंदिर आये. ऐसा नहीं था कि हरुवा भन्चक परमौत से मिलने को मरे जा रहे थे. शाम हो चुकी थी और उनकी देह के पोर पोर से "दारू दो दारू दो" की पुकारें उठना शुरू हो चुकी थीं. हल्द्वानी आने का वह उनका चौथा या पांचवां इत्तफाक था लेकिन नगर का जुगराफिया उनकी समझ में अब तक नहीं आया था. वे अपने प्रिय भतीजे को तलाशकर उसके साथ पौने चार सौ मिलीलीटर की एक भूरी शीशी खाली करने की मंशा में परमौत को खोजते हुए उक्त घटनास्थल पर पहुंचे थे.

हमारी मंडली थोड़ा आगे एक वीरान गली में एट होम अटैंड करने की शुरुआती रस्म के तौर पर अद्धे से अपने गलों को भिगोकर सतनारायण मंदिर के गेट पर पहुँची ही थी कि परमौत की निगाह अपने हरुवा चचा पर पड़ी.  'भ' अक्षर से शुरु होने वाले दो सम्मानसूचक शब्द एक साथ निकालकर वह स्वतःस्फूर्त तरीके से बोला - "अबे यार लग गयी भन्चक ... ये साले चचा कहाँ से आ गया."

परमौत के ऐसा बोलते ही इधर चचा-भतीजे की नज़रें एक दूसरे से टकराईं  उधर लाईट चली गयी.

इस घटना के चालीस मिनट के भीतर बमय हरुवा भन्चक हम चारों सरकारी अस्पताल में थे.  

(जारी)

Sunday, January 8, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - आठ



परमौत की प्रेम कथा - भाग आठ 

चाय-कम-चैंटू-सेंटर में लफंडर छोकरों द्वारा दी गयी अप्रत्याशित चुनौती से आहत और पराजित हुआ परमौत फैसला नहीं कर पा रहा था कि क्लास जाए या नहीं. प्रत्यक्षतः उसकी रणनीति फ़ेल हो गयी थी और उसे किसी दूसरी दिशा में सोचना शुरू करना था. लड़कियों का कम्प्यूटर कोचिंग में घुसना और उक्त लड़कों घटनास्थल से गायब हो जाना एक साथ घटा. वह फिर से वहीं बैठ गया.

उसने हार नहीं माननी थी और किसी भी तरह इस नए अड्डे को अपने नियंत्रण में लाने का जतन करना था. वह सोच रहा था लड़के वहां न होते तो दूर से ही सही लेकिन कितने इत्मीनान से वह मिनट भर के वस्ल का सुख प्राप्त कर सकता था. उसने गिरधारी लम्बू के नगर में उभरते हुए गुंडे के हालिया स्टैटस की सेवाएँ लेने अर्थात इन वाहियात लौंडों की सुतवाई कराने के बारे में भी विचार किया पर इससे हीरोइन के बागी हो जाने और अपनी फजीहत होने का खतरा था जैसा उसने एक पिक्चर में देखा था. रकीब नंबर एक यानी लम्बू अमिताब ने उसके दिमाग के एक अलग कोने पर कब्ज़ा किया हुआ था. लगातार परेशान करने वाला उसके दिमाग का यह हिस्सा उसके भीतर की स्क्रीन पर अक्सर हताश करनेवाली लम्बी-लम्बी सीक्वेंसें प्रोजेक्ट करता रहता था जिसमें पिरिया लम्बू के साथ भाग जाती थी या उन दोनों की शादी का समारोह चल रहा होता या वे दोनों मोटरसाइकिल पर नैनीताल की तरफ़ जाते नज़र आते. एक साइड को पाँव लटकाए बैठी पिरिया की एक बांह लम्बू की कमर को थामे रहती. कभी कभार इस स्क्रीन पर परमौत हम तीनों दोस्तों के साथ मिलकर गोल्डन रेस्तरां के बाहर लम्बू को धुन रहा होता था. यह आख़िरी वाली सीक्वेंस देखने से परमौत का मन हल्का हो जाया करता.

लड़कों के चले जाने के बाद उसके मन में एक बात और आई. बेशर्मी से ताड़े जा रहे उस समूह में पिरिया के अलावा तीन लड़कियां और भी थीं. क्या मालूम उन लड़कों के मोहब्बत-शिरोमणि की निगाह उन तीनों में से किसी पर हो. इस विचार को उसने तुरन्त खारिज कर दिया. पिरिया के होते हुए किसी और पर निगाह कैसे डाल सकता है कोई भी. वह लाखों में एक थी. उस के लाखों में एक होने के तथ्य ने ही तो परमौत का ऐसा हाल बना दिया था. पहले उसने साढ़े चार तक वहीं रहकर एक दफ़ा और अपने मन की मुराद पूरी करने के बारे में सोचा लेकिन लौंडे फिर से आ गए तो? होंगे पिरिया के कितने ही आशिक साले. बला से सारा हल्द्वानी उसका आशिक हो जाए शादी तो उससे लेकिन मैं ही करूंगा. इस पॉजिटिव नोट पर अपने विचारों को विराम देते हुए रुद्दरपुर जाकर पिछली उगाहियाँ निबटाने का निर्णय उसे ज्यादा तात्कालिक महत्त्व का लगा.

टांडा के जंगल की प्रच्छन्न हरियाली और ट्रैफिकहीन रास्ते ने हमेशा की तरह उसकी विचारश्रृंखला को रास्ते पर लाने का काम किया और उसने वही किया जो उसे करने चाहिए था. वह दो बोतलें और कुछ सामान लेकर गोदाम पहुँच गया जहां 'आये कुछ चिप्स कुछ शराब आये' की तर्ज़ पर हम उसके आने की उम्मीद में प्रतीक्षारत थे. नब्बू डीयर की जेब में उसके हिसाब से एक बेमिसाल ऐतिहासिक दस्तावेज़ था जिसे वह "पहले परमोद को आने दो फिर दिखाता हूँ" कहकर आधे घंटे से हमारे सब्र का इम्तहान ले रहा था. परमौत के आने से हमारे शरीरों में आशानुरूप आशा का संचार हुआ.

बोतलें किनारे रख पहले उसने अपने सतत संघर्ष और उस दिन बाज़ार में हुई घटना का विस्तृत वर्णन किया और अपनी आशिकी के मार्ग में आई नवीनतम अड़चन से हमें परिचित करवाया. पिरिया की मोहब्बत में अपने जीवन की ऐसी-तैसी हो चुकने और दोस्ती के नाम पर हमसे इस मीठे नशीले दलदल से उसे बाहर निकालने में सहायता करने की मांग की - "कभी तुमारा भी ऐसा ई बखत आयेगा तो फिर परमोद-परमोद मत करना हरामियो ...!"

परमौत की मनःस्थिति में पिछले महीने-डेढ़ महीने में भयंकर परिवर्तन आया था और इसका असर उसके चेहरे पर साफ़ झलकना शुरू हो चुका था. मुझे अहसास हुआ कि दोस्तों के तौर पर हम कितने बड़े मतलबी और हरामी हो चुके थे. एक लड़की के चक्कर में हमारा दानवीर कर्ण ऐसी दयनीय हालत में पहुँच गया था और हम बस उसके बोतलें लेकर आने के इंतज़ार में सुबहों की शाम किया करते. उसे हमसे इससे ज़्यादा सहानुभूति और वफ़ा की दरकार थी. हम भयंकर रूप से असफल साबित हुए थे. मुझे ग्लानि होने लगी.

गिरधारी लम्बू जैसा संवेदनाहीन मानव भी गिलास बनाने के बजाय परमौत की कहानी सुनकर ग़मगीन हो गया दिखने लगा. नब्बू डीयर पर अलबत्ता बहुत अधिक असर नहीं हुआ पर उसने अपनी सीट बदल ली और परमौत के कंधे के गिर्द अपनी बांह डालकर उसे ज्ञान परोसने लगा - "नाराज मती हो यार परमौती ... इतना सबर किया है तो थोड़ा और कर. वो कैते नहीं हैं कि भगवान के यहाँ साली देर लगने वाली हुई अंधेर जो क्या होने वाली हुई. देख वस्ताद, सब को जीना भी यहीं ठैरा और मरना भी यहीं ठैरा. मुकेश गुरु क्या कह गए हुए कसम से कि जग को हंसाने के लिए पैन्चो बहुरुपिया रूप बदल-बदल के आने वाला हुआ. यहीं स्वर्ग हुआ और यहीं आप समझ ले नरक भी होने वाला हुआ. मुकेश गुरु कैने वाले हुए कि मोब्बत करके आदमी गर्दिश का तारा बन जाने वाला ठैरा ... और भगवान के यहाँ देर हुई अंधेर कब्भी नहीं होने वाली हुई ... ये देख ..." लुरिया भकार उर्फ़ राजकपूर की जोकर वाली पिक्चर से सीखे इस वेदज्ञान की बघार से परमौत को अभिभूत कर चुकने के बाद नब्बू डीयर ने जेब से शादी के कार्ड जैसा दिखने वाला वह दस्तावेज़ बाहर निकाला.

"अब चूतियापंथी तो करो मत यार नबदा. ये साला सादी का कार्ड क्यों दिखा रहा हुआ अब? ... और बता क्या कैने वाले हुए तेरे मुकेश गुरु ..." 

"मुकेश गुरु कहने वाले हुए बेटे कि चाहे कुछ भी हो जाए चाहे तुम हमको भूल जाओ और चाहे वो हमको भूल जाएँ लेकिन सच्ची मोहब्बत करने वाले हमेशा एक दूसरे के ही होने वाले हुए ... और ..." - विषय पर आते हुए नब्बू डीयर ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा - "गणिया की शादी का कार्ड लाया हूँ बे. हम सबको न्यौता भेजा है उसने. सुन रहे हो बे हल्द्वानी वालो - छब्बीज्जनवरी को फैरने वाला है छविराम का झंडा सतनारायण धरमसाला में ..."

गणिया उर्फ़ गणेश उर्फ़ छविराम की शादी की सूचना से गोदाम में एक सुखद हड़कंप मच गया.

"किस्से हो री ..." गिरधारी ने गिलास भरते हुए उत्सुकता से पूछा.

"किस से क्या मतलब? उसी से हो रई जिस से होनी थी - फूलन से और किस से ..."

"मतलब उस दिन अस्पताल में तूने-मैंने जो सुना था वो सचमुच की मोब्बत थी ... मतलब फूलन के भाई ने मना नहीं करा होगा ऐसे घंट से अपनी बहन की शादी करने से ... देखने में हीरोइन से कम नहीं हुई फूलन और घर भी साली का ठीकठाक हुआ ... कहाँ वो कहाँ ये अपना भ्यास गणिया ... हद्द हो गयी ..." अपने दर्द को भुलाकर परमौत अब फूलन-छविराम के विवाह की खबर से उत्तेजित होकर सरहद पर तैनात किसी सिपाही की तरह चौकस हो गया था.

"और कहाँ पिरिया और कहाँ तू रे खबीस परमौतिया. किसी के मूं पे जो क्या लिखा रहने वाला हुआ कि किसके मल्लब भाग्य में क्या लिखा ठैरा. तू जो ये इतने दिन से डुडाट पाड़ रहा है कि मर गया मर गया ...  गणिया को देख जरा. न साले के पास पैसे हुए, न शकल हुई. कैसे गदागद मारने वाला हुआ उसको वो फूलन का भाई काठगोदाम के थाने ले जा-जा के.  तुझे मालूम ही हुआ. एक बार भी डाड़ मारते देखा तूने गणिया को ... आज देख ... हड्डियां टोड़ा-टुड़ू के भी साला शान से अपने घर ले जाएगा फूलन को ... वो भी छब्बीज्जनवरी को ... काठगोदाम के थाने में ही अपनी बहन की शादी का तिरंगा फैराएगा दरोगा उस दिन... अपने को देख ज़रा - हम्मेशा साला डाड़ाडाड़-टिटाट-डुडाट ... अबे प्यार कर रहा है कि भांग का पौडर बेच रहा है पैन्चो... सबर कर, मेनत कर, ज़रा मरद बन के गणिया से सीख ... ऐसेई मर जाता हूँ मर जाता हूँ कैने से हो जाती होगी शादी ... ना तेरे को पैसे की कमी हुई, ना घर में पूछने को ईजा-बाबू हुए, एक तेरा हुड्ड ददा ठैरा बस ... उस से ही डरने वाला हुआ तू जैसे ... और फिर हम साले मर गए हैं कोई अभी से ..."

नब्बू डीयर का भाषण असरदार था और कभी-कभार उसकी जिह्वा पर सवार हो जाने वाली सरस्वती माता के आशीर्वाद के कारण पैदा होने वाली उसकी वक्तृता का लोहा हम लोग लम्बे समय से मानते आये थे. परमौत ने एक के बाद एक दूसरा गिलास हलक में उड़ेला और नब्बू डीयर के गले लगता हुआ सचमुच का इमोशनल होता हुआ बोला - "तेरी बात में दम हुआ यार नबदा ... सही कैता है ... ऐसेई हार जो क्या जाना हुआ ... नबदा सही कैने वाला हुआ ... हमारा उस्ताज ठैरा तभी तो... अब कल से पिरिया से सादी का प्रोजेक्ट चालू ... गोल्ल गंगनाथ द्यप्ता की कसम कल से ... हर हाल में ... उठो पंडित, चलो बेटा गिरधारी... गणिया-फूलन अमर रहें  ... आत्तो पाल्टी होगी ..."


(जारी) 

Saturday, January 7, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - सात


(पिछली क़िस्त से आगे)

परमौत की प्रेम कथा - भाग सात 

अपने सखा द्वारा ज़हर खाकर मर जाने की सीरियस धमकी दिए जाने के बाद पहली बार हमें परमौत के पोस्ट-कम्प्यूटर-क्लास मल्टी-मोहब्बतनामे के इस कालखंड के अपनी सामूहिक जिंदगियों में पड़ रहे प्रभावों के बारे में संजीदगी से विचार करने पर विवश होना पड़ा. तय था कि पिरिया की मोहब्बत में परमौत की गिरफ्तारी के बाद से गोदाम एक निर्जीव अड्डे में बदलता जा रहा था. नब्बू डीयर का नैराश्यभरा जीवनदर्शन वैसे ही कम मनहूस था जो परमौत भी उसी लाइन पर निकल पड़ने को उद्यत था. इस माहौल को हम सब के मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी भी दशा में मुफीद नहीं कहा जा सकता था. गोदाम के जीवनदायी आनंद-उत्स को बचाया जाना अनिवार्य था. लेकिन बड़ा सवाल था कि किया क्या जाए.

नब्बू डीयर की मुकेश-पीड़ित आत्मा के भीतर एक और आत्मा बसती थी जो घनघोर काइयां, मौकापरस्त और स्वार्थी थी. संक्षेप में वह हरामी था. हम तीनों इसे जानते थे लेकिन वह हमारा बचपने का दोस्त था. हमारे विश्वास पर मोहर लगाते हुए उसने परमौत को ऑफ़र दिया कि यदि वह चाहे तो पिरिया से आशिकी करता रहे और अगर ज़्यादा तकलीफ न हो तो ससी के साथ उसकी फ्रेण्डसिप करा दे. उसका बोझ हल्का हो जाएगा और नब्बू को मित्रधर्म निभाने का अवसर मिल जाएगा. इतनी ज़्यादा प्रत्यक्ष और टुच्ची सलाह से भड़क गए गिरधारी लम्बू ने नब्बू को खरीखोटी सुनाते हुए उसे परमौत की पुच्छवाटिका में जादे न घुसने और मुकेश के गानों में ही मोक्ष तलाशने की महायात्रा में लगे रहने की मित्रवत सलाह भी - "तेरे बूते की ना है नब्बू गुरु. तुम तो गाने सुनो और ये भूरा वाला नुवान पीते जाओ बस." वह परमौत से मुखातिब होकर बोला -"यार परमौद्दा देख ... सब परेशानी ये साले कम्पूटर-हम्पूटर के चक्कर में शुरू हुई है. छोड़ साले को. कौन सा तूने वो जगदीच्चन बोस बनके नौकरी में लगना हुआ. मैं तो कैता हूँ धंधे में ध्यान दे. मन लगा के पैसे कमा. ये पिरिया-फिरिया जैसी हज्जार लौंडियें तेरे आगे लाइन लगाने को तैयार नहीं हुई ना तो बाप कसम मेरा नाम बदल देना यार ..."

गिरधारी लम्बू का आइडिया मुझे भी जंच रहा था. कम्प्यूटर सीखने से भी परमौत से उखड़ना कुछ था नहीं. हाँ पिरिया से मोहब्बत करना एक उदात्त कार्य था जिसे करते हुए परमौत जैसे अनगिनत आशिक सहस्त्राब्दियों से गली-मोहल्लों में नाम अर्जित करने का इतिहास लिखने में सन्नद्ध रहे थे और वह उसे करता रह सकता था. मेरे ऐसा कहने पर वह बोला - "अबे अगर मैं वहां जाना छोड़ दूंगा तो पिरिया को कैसे देखूँगा? कोर्स आधा छोड़ने पर ददा नाराज हो जाएगा नफे में."

गिरधारी ने परमौत को उलाहना दिया - "तो जा फिर वहीं अपनी बेज्जती खराब कराने, परमौद्दा. कल तक तेरी वो मोटी वाली हीरोइन आधे हल्द्वानी को बता चुकी होगी कि उसकी सादी तेरे साथ तय हो गयी है ... फिर सनिच्चर-सनिच्चर उसी के साथ भुट्टे खाने सलड़ी-चन्दादेवी के चक्कर लगइयो..."

हल्द्वानी में शनिवार को बाज़ार बंद रहती है और उस दिन प्रेमी लौंडों द्वारा स्कूटर-मोटरसाइकिल इत्यादि वाहनों की पिलियन सीट पर अपनी लैलाओं-शीरियों-साहिबाओं-पिरियाओं को बिठाकर इन तीर्थस्थलों पर में लहसुन का नमक और मक्खन लगे भुने हुए भुट्टे का प्रसाद खिला कर लाने की परम्परा करीब दस हज़ार सालों से चली आ रही है. प्रेमीजनों की अटूट मान्यता है कि इस प्रसाद भोग लगाने-लगवाने के बाद ही फ्रेण्डसिप का देवता प्रसन्न होता है.

सलड़ी-चन्दादेवी के भुट्टों की बात चलने पर नब्बू डीयर बोल पड़ा - "भुट्टे तो साले दोगांव के बढ़िया होते हैं यार. एकदम मुलायम दाने वाले. सलड़ी-चन्दादेवी वाले महंगे भी होते हैं और कड़ियल भी. पंडित याद है उद्दिन कितना मज़ा आया था जब तू-मैं दोगांव गए थे वो सुरिया की ईजा के मरे वाले दिन रानीबाग से. वैसे तो भुट्टे सबसे बढ़िया होने वाले हुए पहाड़ के. मेरी ईजा के गाँव चलेंगे कभी यार ... मतलब मेरे मकोट ... क्या गज़ब होने वाले हुए वहां के भुट्टे साले ...खाने वाला कोई हुआ नहीं वहां. बस एक मामा ठैरे उनको भुट्टे खा के गैस जैसी हो जाने वाली हुई. कितनी दफे मुझसे कहते हैं बिचारे कि नबुआ कभी मकोट आ जाया कर भुट्टे के सीज़न में ... बोर-बोरे भर के भुट्टे बाँट देने वाले हुए गाँव वालों को मामा ... यहाँ हो रहे होते वैसे भुट्टे तो उन्हीं को बेच-बाच के बिचारे लखापति बन गए होते कब्भी के ..."

बात परमौत की मोहब्बत के मुस्ताबिल की चल रही थी और नब्बू अपने भुट्टा और मकोट-प्रेम में धंसता चला गया. उसके अनर्गल भुट्टा-व्याख्यान में कुछ शिद्दत रही हगी कि परमौत बोल उठा - "कुछ  भी कह लो नब्बू वस्ताज भुट्टे बनाने वाला ठैरा दोगांव में वो किनारे वाला ... क्या नाम है उसका ... वो शिबुआ ... मल्लब साले के यहाँ सिल-बट्टे में पिसा लहसुन-खुश्याणी का चरबरान नमक सारी दुनिया में कोई क्या बनाता होगा ...  आहा ग़ज़ब ..."

"ना ना वो भी मल्लब बढ़िया बनाता है लेकिन ममाजी के यहाँ जो है ..."

करीब आधे घंटे तक सब कुछ भूल-भुला के हम हल्द्वानी और उसके आसपास मिलने वाले भुट्टों की क्वालिटी को लेकर वार्तालाप में रमे रहे. इसका तात्कालिक लाभ यह हुआ कि परमौत के दिल का मामला कुछ देर स्थगित रहा अलबत्ता जब घरों को जाने का समय आया तो मैंने उस से पूछ ही लिया - "तो फिर क्या तय रहा?"

"क्या मल्लब क्या तय रहा?"

"मतलब ये कि कल से कम्प्यूटर क्लास का क्या करने वाला है तू?"

"सोचेंगे पंडित गुरु सोचेंगे .... सोचेंगे ..."

परमौत ने रात भर सोचा और तमाम तरह की कैलकुलेशन लगा कर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पिरिया से मोहब्बत तो बिना कम्प्यूटर सीखने जाए भी जारी रखी जा सकती है. एक खतरनाक चुनौती की तरह मुंह बाएं खड़े मुटल्ली ससी के मामले को शीघ्रातिशीघ्र निबटाया जाना अनिवार्य था. पिरिया के आगे अपना इम्प्रेशन अब किसी भी कीमत पर डाउन नहीं होने देना था. ससी और उसकी लम्बसखी से निजात पाने का सबसे उचित तरीका कल रात उसे दोस्तों ने बता दिया था. बड़े भाई परकास को तो वह कैसे भी  सम्हाल लेगा.

उसने सुबह जल्दी उठकर, नहा-धो कर, मोपेड पर मसालों की खेप लादी और काठगोदाम-रानीबाग से लेकर तिकोनिया तक के सारे दुकानदार बारह बजे तक निबटा दिए. भाई-भाभी किसी घरेलू समारोह में हिस्सेदारी करने कालाढूंगी गए हुए थे और डेढ़ बजे वाले लंच के लिए अनिवार्यतः हर रोज़ घर पर होने की शर्त लागू नहीं थी. रात को तय कर ली गयी अपनी आगामी रणनीति के तहत उसने गांधी भण्डार के आसपास एक ऐसा गुप्त ठीहा तलाशना था जहाँ उसे सड़क में चलता कोई भी देख न सके और ढाई से चार-साढ़े चार तक के बीच का समय नष्ट किया जा सके और कम से कम दो बार पिरियादर्शन किये जा सकें.

क्लास ढाई बजे शुरू होती थी. काफी दिनों के बाद उसने तिकोनिया में ठेले पर छोले-भटूरों की मौज लूटी और मोपेड को एक दुकान के बाहर लगाकर भविष्य के कार्यक्षेत्र के मुआयने पर निकल पड़ा. गांधी आश्रम से दक्षिण की तरफ घनुवा सौंठ का समोसों का ठेला था और काफी सारी परचूने की दुकानें. इन दुकानों के बाहर टोकरियों में अगरबत्ती, पूजा का सामान वगैरह सजाये लौंडे टाइप के दुकानदार बैठा करते थे. पुरातन छातों और टॉर्च इत्यादि वैज्ञानिक वस्तुओं की मरम्मत करने में पारंगत हल्द्वानी के मशहूर साइंटिस्टों की प्रयोगशालाएं भी इसी दिशा में थी. गांधी भण्डार के उत्तर की तरफ जाने पर भी ऐसा ही दृश्य दिखा लेकिन लेडीज़ कॉर्नर नामक एक जनrl स्टोर-कम-पार्लर से लगी हुई पान की एक दुकान ने परमौत का ध्यान खींचा. दुकान के भीतरी हिस्से में मटमैले-भूरे प्लास्टिक के आवरण से ढंकी एक मेज़ पर धरे मैल में लिथड़े गैस के चूल्हे और चार-छः चीकट कुर्सियों ने परमौत के अनुसंधान को जल्दी पूरा करने में मदद की.

"चाय मिलेगी दाज्यू?" उसने भरसक बेपरवाह दिखने की कोशिश करते हुए गद्दी पर पालथी मारे बैठे धोती-कुरताधारी  ठिगने दुकानदार से पूछा.

"बैठो साब. लौंडा जरा दूध लाने गया हुआ है ... पांच मिनट की बात है ..."

परमौत ने खोखानुमा दुकान के भीतरी हिस्से में प्रवेश किया और तुरंत ही इस नवीन अड्डे ने उसे अपने आकर्षण में बाँध लिया. फर्श पर बीड़ी-सिगरेट के बेशुमार ठुड्डे बिखरे हुए थे. कुर्सियों के बीच एक ऊंची तिपाई रखी हुई थी जिसके बीचोबीच धरे गए कांच के गिलास के अन्दर 'चाबी' ब्रांड माचिस का डिब्बा घुसा हुआ था. जितना अँधेरा ऐसी जगहों को ऐसी जगहें बनाता है, वहां उतना ही अँधेरा था - न कम न ज्यादा. गोदाम में हम लोगों ने जिस चैंटू के खेल को अपना राष्ट्रीय खेल बना रखा था उसे खेलने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सुविधाओं वाले ऐसे ही स्टेडियम चाहिए होते थे.

लौंडा दूध लेकर नहीं आया था. दुकानदार ने अपनी गद्दी पर बैठे-बैठे उस से पूछा - "कुछ सिगरेट बीड़ी तो नहीं चाहिए साब?"

"लाओ गुरु एक कैपिस्टन पिलाओ जरा तब तक"

परमौत ने सिगरेट सुलगाई और चैंटू खेलने लगा. इस खेल में माचिस को मेज़ के किनारे इस तरह रखना होता है कि एक साइड से उसका छोटा सा तिकोना कोना बाहर की तरफ निकल आये. दो उँगलियों को एक खास पोजीशन में लाकर उन की मदद से इस बाहर निकले कोने को हिट करके माचिस के डिब्बे को इस तरह फ्लाईट देने की कोशिश करनी होती है कि वह गिलास के भीतर टपक जाये. अगर माचिस सुलटी होकर मेज़ पर गिरे तो आप आउट और उलटी गिरे तो एक पॉइंट. खिलाड़ी आउट होने तक खेलता रह सकता है. डिब्बा मेज़ पर गिरकर अपनी साइड पर खड़ा हो जाए तो पांच पॉइंट और सीधा खडा हो तो दस. गिलास में माचिस घुसने के बीस पॉइंट मिलते हैं. माचिस तिपाई अथवा मेज़ से बाहर गिर जाए तो पांच पॉइंट की पेनाल्टी पड़ती है और आप आउट. अस्सी के दशक में हल्द्वानी के कई होटलों-खोखों में चैंटू को बाकायदा जुए की शक्ल दे दी गयी थी और अपने नब्बू डीयर इस खेल के सर्वमान्य चैम्पियन माने जाते थे.

परमौत चैंटू की प्रैक्टिस करते हुए सड़क का जायजा भी करता जाता. गांधी भण्डार और कम्प्यूटर सेंटर में घुसने वाले हर प्राणी को बिलकुल साफ़-साफ़ देखा जा सकता था. यानी परमौत की रिसर्च सफल रही थी. लौंडे ने चाय भी उम्दा बनाई थी. पान की दुकान का धंधा खतरनाक तरीके से मद्दा चलता दिखता था और ठिगना दुकानदार जीवन के तमाम मोहों से परे पहुंचे चुके किसी संन्यासी की वैराग्यपूर्ण दृष्टि के साथ अपने सामने हो रहे बाज़ीच-ए-अत्फ़ाल का मुआयना करने में मसरूफ़ था. अपनी दूसरी चाय और दूसरी ही सिगरेट ख़तम कर वह बाहर आकर पैसे देने लगा. पचास का नोट देखकर दुकानदार ने कराह सी निकाली - "अब टूटे कहाँ से लाऊँ साब ...". परमौत ने इस मौके को ताड़ते हुए दांव चला - "अरे दाज्यू एडवांस रख लो यार ... कौन सा ऐसी आफत आ रई साली ... अभी आ के ले जाऊंगा."

दुकानदार कृतज्ञता से भर उठा और उसने अविश्वास से भरी एक नज़र परमौत पर डाली.

"ठीक हुआ साब. आप कहते हो तो ऐसा ही सही ... नहीं तो फिर दे जाना ... पैसे का क्या है ..." पचास का नोट गद्दी के नीचे जा चुका था और दुकानदार से साथ साथ अब लौंडा भी परमौत को इस निगाह से देखने लगा था जैसे वह कोई बहुत बड़ा लाटसाहब हो.

दो पंद्रह पर परमौत पुनः पान-कम-चाय खोखे पर था.

"चाय  बना रे लौंडे साहब के लिए" कहकर दूकान में उसका स्वागत किया गया. अंदर परमौत की ही उम्र के तीन-चार लड़के चैंटू खेल रहे थे और किसी अश्लील बात पर ठहाके लगा रहे थे. परमौत के भीतर घुसने से वे दसेक सेकेण्ड को झेंप कर शांत हुए. इतनी ही देर में उन्होंने ताड़ लिया कि वह बेमतलब और हानिरहित था. परमौत को उम्मीद थी कि इतनी मुश्किल से मिली वह जगह उसे खाली मिलेगी जिसकी तन्हाई से वह पिरियादर्शन कर सकेगा लेकिन इन बदतमीज़ लड़कों ने उसके प्लान का गोबर बना दिया था. न तो वे चैंटू ही सीरियसली खेल रहे थे न चाय ही पी रहे थे. वे किन्हीं दो लड़कियों की बाबत एक सस्ता वार्तालाप कर रहे थे.

परमौत को लगा था कि वे पांचेक मिनट में निकल जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लगता था वे वहां बसने की नीयत से बैठे हुए हैं. लौंडे ने परमौत को चाय थमाई ही थी कि उनमें से एक लड़का बाहर निकला और कुछ देखने लगा. उसकी मुद्रा बता रही थी कि वह इस दिशा में आ रहे लोगों को ताड़ रहा है. अचानक वह बदहवास सा होकर अन्दर घुसा और बोला - "मुकेस तेरी वाली आ गयी बे ..."

परमौत को पूरा मसला समझने में एक सेकेण्ड से कम समय लगा. जिस कारनामे को करने की जुगत में इस अड्डे को तलाश कर लेने के बाद वह खुद को बहुत ज़्यादा अकलमन्द और स्मार्ट समझ रहा था, ये लड़के उसी में पीएचडी कर चुके थे.

चैंटू छोड़-छाड़ कर लड़के जल्दी-जल्दी बाहर निकलने की होड़ में उठना शुरू कर चुके थे.

परमौत ने निगाह सड़क पर लगाई तो देखा उसके साथ पढ़ने वाली तीन-चार लड़कियां सर झुकाए, कापी-किताब थामे गांधी भण्डार की तरफ जा रही थीं. उनमें पिरिया भी थी.

"सई में क्या माल है यार मुकेस" एक लड़का लार टपकाता फुसफुसा रहा था. उसने माल किसे कहा होगा, इस प्रश्न पर जब तक परमौत विचार कर पाता, वही लड़का पलट कर परमौत से बोला -"चाय जल्दी पी लो दाज्यू, तुम्हारी क्लास का टाइम हो गया."

(जारी)