Tuesday, March 6, 2018

एक हरा-भरा फुटबॉल का मैदान अब एक जुआघर है


ओह अगरतला 
-कृष्ण कल्पित

1.

एक वंचित राजकुमार के गाँव का नाम है अगरतला

सचिन देब बर्मन भाग गया
पहले कलकत्ता फिर बम्बई
सारे मछुआरे चले गये उसके साथ
सारा संगीत
संगे-मरमर से बने हुये
वे सुचिक्कन श्वेत राज-महल
जलाशयों से और आदिवासियों की झोपड़ियों से घिरे हुये

बोडतल्ला (चोर) बाज़ार का नाम है अगरतला के जहाँ त्रिपुरा के मुख्यमंत्री नृपेन चक्रबर्ती सुबह-सुबह रिक्शा में बैठकर मछली ख़रीदने और बाज़ार करने आते थे कोई भूमि-सुधार नहीं, ईमानदारी ही ख्याति रही उनकी अंत तक
1997 में गया था मैं अगरतला और जब 1999 में लौटा तो माणिक सरकार वहाँ का मुख्यमंत्री था

कितना पानी बह गया हाबड़ा नदी में
जो अगरतला को काटती है
जिस पर एक पुल है
जिसमें हर रोज़ कोई लाश मिलती थी 1998 में
त्रिपुरा आतंक से ढकी हुई घाटी का नाम है
जिसकी राजधानी अगरतला है

त्रिपुरा के राजा ने पहचानी थी
किशोर रवींद्र की प्रतिभा
दिया था वज़ीफ़ा विदेश-यात्रा का

97 में साइकिल पर चल कर आता था माणिक सरकार दूरदर्शन के दफ़्तर वहीं केंटीन में खा लेता था खाना जिसे शायद वह सिगरेट पीने के लिये खाता होगा उसकी सरलता, सादगी, ईमानदारी के किस्से जनमानस में आज तक प्रसिद्ध हैं लेकिन उससे कोई नहीं पूछता कि तुमने 20 बरसों में क्या किया वही तस्करी, वही आतंक, वही हत्यायें, वही दमन, वही ग़रीबी क्या किया तुमने

तुम्हारे सामने कोकबरोक जैसी ज़िंदा ज़बान को ख़ामोश किया जाता रहा

प्रिय माणक सरकार,
लो सिगरेट पिओ और मेरी बात सुनो कॉमरेड,
मुख्यमंत्री मदर टेरेसा नहीं होता

ओह, वे कूपियों की झिल-मिल रोशनी से चमकते बाज़ार
वे तड़पती हुई मछलियाँ

आज 20 बरस बाद याद आया अगरतला
जो कभी अगर के अनगिनत वृक्षों से घिरा हुआ था
जिसकी धूम से कभी समूचा आर्यावृत धूमायित रहता था !

2.

अगरतला अब एक टूटी हुई बाँसुरी है

एक हरा-भरा फुटबॉल का मैदान
अब एक जुआघर है

उजड़ा हुआ एक चाय-बाग़ान

नाथ-पंथियों की प्राचीन रमण-स्थली
हिंदुत्व की नयी प्रयोगशाला

उड़ीसा और बंगाल से पहले
यह ताबूत की अनन्तिम कील है

जिस विजन-पथ से चोरी-छुपे तुम आती थी मिलने
त्रिपुर-सुंदरी,
वह अब लुटेरों की राह है !

3.

रेलगाड़ी पहुँची अगरतला
मेरे लौट आने के बाद

ढाका और अगरतला के बीच जो चलती थी
वह बस बन्द हो गयी होगी

चोर बाज़ार के नुक्कड़ पर बिकता
वह ज़हीन गाँजा
और सौ-सौ रुपये में बिकती
बांग्लादेश से तस्करी के जरिये आई सूती कमीज़ें

मंदिरों में नहीं
इलेक्शन-बूथों के सामने औरतों की अति लंबी कतारें

नदियों को और सुंदर बनाती हुईं नावें
ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार

जिस साल मैं लौटकर आया त्रिपुरा से
उस समय अगरतला में एक सोनमछरी पैदा हुई थी

बाँस और बाँसुरियों के देश में

अनन्नास अब तक रस से भर गये होंगे !

Tuesday, February 27, 2018

असल आवाज का जादू नकलची नहीं समझेंगे

मैं राहुल पाण्डेय के गद्य और उनकी विट का दीवाना हूँ. राहुल के पास वह बेजोड़ टाइमिंग है जिसे पाने के लिए बड़े-बड़े लेखक जीवन भर तरसते हैं. उनके फेसबुक (https://www.facebook.com/risingredrahul/) और यूट्यूब (https://www.youtube.com/channel/UC3woLhE59Ls-eD5iEq_twkw)  पेज बार-बार देखी जानी लायक चीज़ें हैं. वे ख़ामोशी से हमारे समय को दर्ज करने का बड़ा काम कर रहे हैं.
राहुल पाण्डेय और उनकी मीनू

असल आवाज का जादू नकलची नहीं समझेंगे
-राहुल पाण्डेय

कुछ साल पहले अयोध्या में एक शायद कभी न बनने वाली फिल्म के लिए ऑडिशन ले रहा था. कला की गर्मी में उबलते लोगों की कतार लगी थी, पर हम ठंडे होते जा रहे थे. बात यह थी कि गाने वाले सारे के सारे लोग किसी न किसी की आवाज की नकल कर रहे थे. अपनी नकली आवाज से वे एक प्रसिद्ध पर बेहूदे और नकलची सूफी गायक के आसपास पहुंचने की कोशिश में लगे थे. यह नकल हमारे सपनों पर तेजाब फैला रही थी. हमने तीन-चार दिन तक ऑडिशन लिया, मगर क्या मजाल कि एक भी ओरिजनल आवाज हम तक पहुंच पाती. उस ऑडिशन में गिरी से गिरी हालत में भी लगभग दो दर्जन लोगों ने गाया, लेकिन हमें कुछ नहीं सुनाई दिया.

तंग आकर हमने कैमरे के लेंस पर ढक्कन लगा दिया. हमें कोई आशा नहीं थी कि नकल का जो ढक्कन गवैया बनने के नए ख्वाहिशमंदों ने अपनी आवाज पर लगा रखा है, उससे हमें कोई मदद मिल पाएगी. फिर कई दिनों तक उन गवैयों का फोन आता रहा, और मैं समझाता रहा कि नकल से कुछ नहीं होने वाला. अभी कुछ दिन पहले फैज अहमद फैज की गजल दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार केके लिए फिर आवाज की तलाश शुरू हुई. इसमें कोई दो राय नहीं कि फैज को चाहने वाले जितने अपने देश में हैं, उतने दुनिया के किसी दूसरे देश में नहीं. लेकिन बात जब आवाज की आई तो मैं फिर अपने देश से हार गया. कोई मेंहदी हसन बनता है तो कोई गुलाम अली. अपवादों को छोड़ दें, तो इस मामले में भी अपने यहां के नकलचियों ने नाक कटा रखी है. 

हारकर मैं सीधे पाकिस्तान पहुंचा, जहां एक बंद अंधेरे कमरे में फैज को उसी हद तक गुनती एक आवाज मिली, जिसके आसपास ही कहीं मोहब्बत गुलजार होती है. आवाज शायद सिंध की थी और लहजा नात का था. उस आवाज की मोहब्बत में मैं कुछ यूं मुब्तिला हुआ कि अभी तक उसे खुद से चिपकाए हुए हूं. न सिर्फ खुद से, बल्कि अपने यहां की गुलाबबाड़ी से भी इसे चिपका दिया. बगैर किसी साज के आती उस आवाज के ऊपर मैंने अयोध्या-फैजाबाद के चित्र चस्पां किए और वाया इंटरनेट वापस उसे पाकिस्तान पहुंचा दिया. ऐबटाबाद की लुबना और कराची की नूर बेगम इनबॉक्स में उतर आईं. उनका चिपकाया सुर्ख लाल रंग का दिल मेरे इनबॉक्स में हमेशा महफूज रहेगा. और फैसलाबाद में उन मौलवी साहब की दुआ भी, जो हमारी गुलाबबाड़ी देखकर बरबस निकल बैठी होगी- अल्लाह ताला आपको हर नजर बद से महफूज रखे.यह असल आवाज का जादू था. नकलची नहीं समझेंगे.

(नवभारत टाइम्स से साभार) 

Monday, February 26, 2018

तुम्हें 2019 की चिंता है मैं 2119 को देख रहा हूँ

स्वीडिश चित्रकार मिया साल्बर्ग की पेन्टिंग 'द लास्ट बस'

अंतिम आशा
-कृष्ण कल्पित

जो मंदबुद्धि यह सोच रहे हैं कि
मौज़ूदा सरकार का तख़्ता-पलट होने के बाद रामराज्य आ जायेगा
वे मुग़ालते में हैं और बहुत कम सोच रहे हैं
तुम देश के बारे में सोच रहे हो
जबकि यह पूरी पृथ्वी अंदेशों से घिरी हुई है
एक काली छाया मंडराती रहती है इसके चारों ओर
तुम्हें २०१९ की चिंता है
मैं २११९ को देख रहा हूँ
अभी यह दुनिया और रसातल में जायेगी
सात सौ समुद्रों का पीछा सात सौ समुद्री-डाकू कर रहे हैं
स्त्रियों को सताया जाता रहेगा
दलितों-आदिवासियों के घर जलाये जाते रहेंगे
कमज़ोर को अपराधी ठहराया जाता रहेगा
क्लासिक-फ़ासीवाद की सतत प्रतीक्षा में बैठे कवियो
अभी यह दुनिया अधिक बर्बर होगी
लुटेरों ने कहर बरपा रखा है
धर्म अभी सबसे बड़ा अधर्म है
राष्ट्र और लोकतंत्र नहीं
मनुष्यता अभी ख़तरे में है
मनुष्य इन दिनों सर्वाधिक गिरा हुआ आदमी है
यह ऐसा समय है
जब टेलीफ़ोन की घँटी बजती है तो लगता है
मौत की घँटी बज रही है
९ बजकर ३० मिनट पर
अजमेरी गेट से जगतपुरा जाने वाली ३०९ नम्बर की
सिटी-बस ही अब अंतिम आशा है !

Saturday, February 17, 2018

हमने पकड़ी पत्रकारिता की वह अंगुली - 4



अशोक जी
आजादी की बाद के वर्षों में कभी अखबार का स्वामित्व कानपुर के मशहूर स्वदेशी कॉटन मिल्स के मालिक सेठ मंगतू राम जयपुरिया के हाथ में चला गया था. 1977 में भी स्वतंत्र भारत में अशोक जी ने काबिल लोगों की टीम जुटा रखी थी. धीर-गम्भीर सत्यनारायण जायसवाल को अमृत प्रभातजाने से पहले चंद रोज ही देख पाया. जायसवाल जी के साथ अमृत प्रभातजाने वालों में के बी माथुर, रमेश जोशी, श्रीधर द्विवेद्वी, आर डी खरे, सुरेश सिंह, वगैरह थे. अमृत प्रभातपहले इलाहाबाद से और बाद में लखनऊ से भी प्रकाशित हुआ. हिंदी पत्रकारिता में वह भी कुछ नयापन लेकर आया.
मुझे याद है कि अमृत प्रभातजाने वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकार स्वतंत्र भारतकी तत्कालीन स्थितियों से खिन्न दिखायी देते थे जबकि हमें वे दिन अपनी पत्रकारिता के स्वर्ण-काल के रूप में याद हैं. जाहिर है कि हालात बदल रहे थे. उन्होंने और भी बेहतर स्थितियां देखी होंगी. हम सुनते थे उन दिनों के बारे में जब पत्रकारों के लिए हाजिरी-रजिस्टर नहीं होता था, जब प्रबन्धन के किसी अधिकारी का सम्पादकीय विभाग का रुख करना बड़ी घटना माना जाता था और सम्पादकीय साथियों को वेतन लेने के लिए भी मैनेजमेण्ट साइडजाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. हर पत्रकार के वेतन का लिफाफा पहली तारीख को समाचार-डेस्क पर आ जाता था.

हमारे समय में भी कुछ साल तक पहली तारीख को खजांची और उनका सहायक कैश-बॉक्स लेकर वेतन बांटने सम्पादकीय विभाग में आया करते थे. सम्पादक और उनकी टीम किसी मंदिर के गर्भ-गृह की तरह पवित्र मानी जाती थी. लेखकों का बड़ा सम्म्मान होता था. स्वतंत्र भारतके रचनाकारों का पारिश्रमिक कम होता था लेकिन हर मास मनी-ऑर्डर से भेजा जाता या फिर प्रूफ रीडर अग्निहोत्री जी सूची और रकम कुर्ते की लम्बी जेब में लेकर घूमते थे. लेखक के कहीं भी दिख जाने पर वे उसे पारिश्रमिक थमाते और हस्ताक्षर लेकर नमस्कार करते थे. उन्हें यह अतिरिक्त दायित्व अशोक जी ने दे रखा था, जिसे निभाने में अग्निहोत्री जी ने कभी कोताही नहीं की.   

स्वतंत्र भारत में सीखने-पढ़ने-लिखने का हमें अच्छा माहौल मिला. हमारी टीम के समाचार सम्पादक वयोवृद्ध चंद्रोदय दीक्षित जी थे, स्वतंत्रता सेनानी और एम एन रॉय के अनुगामी. वह गाम्भीर्य, धैर्य, अनुशासन के प्रतीक और स्नेह-पुंज थे. वैचारिक चर्चा उनकी अशोक जी से ही होती थी और उन्हीं की तरह हमें सिखाने को हमेशा तैयार. उप समाचार सम्पादक शम्भूनाथ कपूर को हमने अपने वरिष्ठ पत्रकार के रूप में नहीं, संरक्षक ही के रूप में पाया. डांटना, पुचकारना, समय पर घर भेजना, किसी बीमार सहयोगी की मदद को दौड़ाना. खेल उनका प्रिय विषय था और जमन लाल शर्मा से पक्की यारी थी. दीक्षित जी और कपूर साहब शाम को नियमित रूप से कॉफी हाउस जाकर बैठते.

अपने दो मुख्य उप-सम्पादकों से अलग-अलग कारणों से हमारा विशेष लगाव था. सियारामशरण त्रिपाठी देश-दुनिया के अच्छे जानकार, खबर बनाने को देने से पहले उसका सार समझा देने वाले, नयी पीढ़ी से मुहब्बत करने वाले थे. कभी खैनी की चुटकी, यदा-कदा जिन का घूंट और चाय पीने के लिए दस का नोट भी वही देते. आईएफडब्ल्यूजे में विक्रम राव के मुकाबिल वही खड़े होते और पराजित होते. नशे की बढ़ती लत ने बाद में उन्हें कमजोर और बरबाद किया.

युवा और तेज-तर्रार वीरेंद्र सिंह यद्यपि वाम-विरोधी थे लेकिन बहुत पढ़ाकू होने के कारण हमारे हीरो भी थे. वे सोवियत खेमे के विरुद्ध अमेरिकी किस्से सुनाते हुए दफ्तर के बाहर घुमाने भी ले जाते लेकिन उनके साथ अपनी चाय के पैसे खुद देने पड़ते थे. अमेरिकी काउ-बॉयअंदाज में रहने वाले वीरेंद्र सिंह अशोक जी समेत पुरानी पीढ़ी की खिल्ली उड़ाते. बाद में वे स्वतंत्र भारत के सम्पादक बने, अमेरिकी सरकार के अतिथि बन कर वहां दौरे पर गये और उसकी प्रशस्ति में अमेरिका-अमेरिकानाम से किताब लिखी. फिर नवभारत टाइम्स ने उन्हें लखनऊ संस्करण निकालने के लिए नियुक्त किया लेकिन वह योजना अमल में ही नहीं आयी. तब दिल्ली में फ्री-लांसिंग करते हुए एक दिन हृदयाघात से उनका निधन हो गया. वाम-समर्थक गुरुदेव नारायण हमें शायरी और संगीत के अपने शौक से प्रभावित करते. अश्विनी कुमार द्विवेद्वी संगीत कार्यक्रमों एवं आकाशवाणी की साप्ताहिक समीक्षा लिखने के लिए आते थे. वे हमसे खूब बातें करते. सांस्कृतिक रिपोर्टिंग का कुछ सलीका हमने उनसे सीखा.

राजनीति, साहित्य-संस्कृति, सामाजिक एवं अन्य विविध क्षेत्रों में सक्रिय नामी लोग स्वतंत्र भारतके कार्यालय आते रहते. कमलापति त्रिपाठी, चंद्रभानु गुप्त, हेमवती नंदन बहुगुणा, क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त, पी डी टण्डन, कॉमरेड रुतम सैटिन, रमेश सिंहा, प्रताप भैया, अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, ठाकुर प्रसाद सिंह, शिवानी, कृष्ण नारायण कक्कड़, प्रबोध मजूमदार, गिरिधर गोपल, मुद्राराक्षस, गोपाल उपाध्याय, बीर राजा, रमई काका, अर्जुनदास केसरी, यमुनादत्त वैष्णव अशोक’, परिपूर्णानंद पैन्यूली, सुंदरलाल बहुगुणा, और भी बहुत सारे लोग, शहर के और बाहर से लखनऊ आने वाले. के पी सक्सेना, उर्मिल थपलियाल, योगेश प्रवीन तब युवा लेखक थे. रचनाकारों की एक बड़ी पीढ़ी स्वतंत्र भारतके बाल संघऔर तरुण संघसे निकल कर पली-बढ़ी.

हमारी युवा टीम के अघोषित लीडर प्रमोद जोशी थे, जो हमसे करीब तीन साल पहले से स्वतंत्र भारतमें काम कर रहे थे. हजरतगंज के जॉन हिंगमें प्रवेश करना हो, मद्रास मेस का दोसा खाना हो या आर्ट्स कॉलेज में आर एस बिष्ट, अवतार सिंह पंवार, जयकृष्ण, पी सी लिटिल या योगी जी की संगत करनी हो या  चेतना बुक डिपो में दिलीप विश्वास से किताबों के बारे में पूछना हो, अगुवाई प्रमोद जी की होती. सीपीआई के कॉमरेड दुर्गा मिश्र प्रमोद जी के नाम न्यू एजलेकर आते तो सीपीएम के कॉमरेड जाहिद अली पीपल्स डेमोक्रेसीतथा सोशल सांइटिस्टदे जाते. यह हमारी साझा सम्पति बन जाता. बहुत सारी चीजें समझ में नहीं आतीं थी लेकिन पन्ने उलटते-पुलटते और अधकचरी बहस करते. देर रात अखबार का नगर संस्करण छोड़ने के बाद पायनियरके गेट पर सुबह तक चाय पीते रहते या कभी सम्पादकीय विभाग की लम्बी मेज पर अखबारों का तकिया बनाकर सो जाते. यह सब हमारी पत्रकारिता का परिवेश था, हमारा स्कूल था.

***

अशोकजी हम नये लड़कों को कुछ न कुछ लिखने या अनुवाद करने को देते रहते. कभी रिपोर्टिंग के लिए भी भेज देते. फरवरी 1978 में एक दिन उन्होंने मुझसे अखबार के लिए लखनऊ शहर पर केंन्द्रित साप्ताहिक कॉलम शुरू करने को कह दिया. कॉलम का नाम परिक्रमारखा और मेरा नामकरण नारदकर दिया. कुछ समय पहले तक स्वतंत्र भारतमें शहर का अंदेशानामक कॉलम प्रकाशित होता था, जिसके लेखक काजीथे. किसी करण उसे बंद करना पड़ा था. परिक्रमाउसी की जगह शुरू हुआ. मेरे लिए यह बहुत अच्छा अवसर था मगर आसान नहीं था. ऊपर से अशोक जी का आदेश था कि इस कॉलम को वे खुद सम्पादित करेंगे. हर हफ्ते कॉलम लिख कर उनके सामने हाजिर होना पड़ता था. वे बाहर होते तो समाचार सम्पादक चंद्रोदय जी जांचते.

अक्टूबर 1978 में दिल का दौरा पड़ने के बाद जब अशोक जी दो महीने बिस्तर पर थे तब भी मुझे हर सप्ताह परिक्रमालिख कर राजभवन कॉलोनी के घर में उनके सामने मौजूद रहना पड़ता था. यह रगड़ाई खूब काम आयी. इस कॉलम में चुटकियां भी खूब ली आती थीं. एक बार मैंने मुद्राराक्षस पर कटाक्ष कर दिया था जब उन्होंने सूचना विभाग के सौजन्य से जनता पार्टी की उपल्ब्धियों पर एक नाटक का मंचन किया था. नाराज मुद्रा जी ने मेरे खिलाफ अशोक जी को चिट्ठी लिखी और खुद उसे देने आये थे. अशोक जी ने मुझसे सारी बात पूछी और समझाया कि चुटकी लो तो व्यक्तिगत आक्षेप न हो. परिक्रमा स्तम्भ लोकप्रिय हुआ और 1983 में स्वतंत्र भारतछोड़ने तक करीब पांच साल मैं इसे लिखता रहा. मुद्रा जी बाद में मुझसे बहुत स्नेह करने लगे थे.

1977 में प्रदेश सरकार ने हिंदी समितिऔर हिंदी ग्रंथ अकादमीको मिला कर हिंदी संस्थान की स्थापना की थी. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी उसके कार्यकारी अध्यक्ष और ठाकुर प्रसाद सिंह निदेशक थे. संस्थान में पत्रकारिता प्रकोष्ठबनवाने में अशोक जी की बड़ी भूमिका थी. उन्होंने ही इस प्रकोष्ठ से पराड़कर जी के अग्रलेखों का संकलन प्रकाशित करवाया, जिसके दो शब्दमें अशोकजी ने लिखा है- “अंग्रेजी के मुहावरों के समतुल्य हिंदी मुहावरों का प्रयोग उनकी दूसरी विशेषता थी. मुझे याद है कि सन 1944 में महात्मा गांधी के जेल से छूटने के बाद उनसे बात करने के प्रस्ताव पर वाइसराय ने अपमानजनक शर्तें लगायीं थीं. तब माननीय श्री श्रीनिवास शास्त्री ने इसकी आलोचना करते हुए लिखा कि क्या वाइसराय चाहते हैं कि गांधी जी उनके सामने सैक क्लाथ ऐण्ड ऐसेजमें जाएं. इस मुहावरे का अनुवाद अनेक अखबारों ने टाट लपेट कर और राख पोत कर जाएं किया. किंतु पराड़कर जी ने लिखा क्या गांधी जी दांतों में तृण दबा करवाइसराय के सामने जाएं.” भाषा के मामले में अशोक जी स्वयं भी इसी परम्परा के अनुगामी थे. शब्दानुवाद की बजाय हिंदी में रूपान्तरण या भावानुवाद के पक्षधर थे.

हजारी प्रसाद जी जब हिंदी संस्थान का कार्यकारी अध्यक्ष पद छोड़ कर चले गये तो अशोक जी को कार्यवाहक उपाध्यक्ष बनाया गया. तब वे रोजाना कुछ समय हिंदी संस्थान में बैठते थे और अपने कक्ष में ही छोटी गोष्ठियां कराया करते थे. इनमें बोलने के लिए उन्होंने मुझे भी प्रेरित किया. मैं बहुत संकोची था और कुछ कहने की इच्छा के बावजूद कतराता था. उन्होंने झिझक तोड़ने में मेरी मदद की.

उन्हीं दिनों अमृतलाल नागर का उपन्यास “नाच्यौ बहुत गोपालप्रकाशित हुआ था. स्वतंत्र भारतके लिए आई समीक्षार्थ प्रति अशोकजी ने मुझे पकड़ा दी थी. नागर जी के उपन्यास की समीक्षा करने की मेरी क्या औकात थी, मगर मैंने बहुत ध्यान से उसे पढ़ा. उपन्यास की ब्राह्मणी नायिका एक मेहतर से ब्याह करके उसकी झोपड़-पट्टी में रहने लगती है, लेकिन वहां भी अपने ठाकुर जी के विग्रह की स्थापना कर पूजा-पाठ करती है. मुझे लगा कि ब्राह्मणी के संस्कार तो वैसे के वैसे रह गये, उसने दलित के जीवन को अपनाया ही कहां. फिर इसे दलित-चेतना का उपन्यास कैसे कहें. मैंने ससंकोच अशोकजी से चर्चा की. उन्होंने सुझाया कि नागर जी से ही मिल कर यह सवाल पूछो. दूसरी सुबह मैं जा पहुंचा चौक. यूं, नागर जी बहुत सरल और उदार हृदय थे लेकिन पता नहीं क्यों मेरे इस सवाल पर नाराज हो गये- अभी तुम बच्चे हो.मैं घबराया-सा लौट आया. अशोक जी को बताया तो उन्होंने कहा था, कोई बात नहीं, तुम लिखो. अब याद नहीं कि मैंने समीक्षा में अपना वह निष्कर्ष लिखा था या नहीं. वैसे, मेरी राय आज भी बदली नहीं है. नाच्यौ बहुत गोपालकी तुलना में तब गोपाल उपाध्याय का उपन्यास एक टुकड़ा इतिहासदलित चेतना के दृष्टिकोण से बहुत सशक्त उपन्यास था. हिंदी में तब इस नारे के तहत लेखन शुरू नहीं हुआ था.    

अशोकजी ही नहीं, नये पत्रकारों-रचनाकारों को प्रोत्साहित करने में उस दौर के वरिष्ठ लेखक पर्याप्त रुचि लेते थे. काफी हाउस के एक कोने से, दीवार पर लगी इस चेतावनी के बावजूद कि लाउडेस्ट व्हिस्पर इस बेटर दैन अ लो शाउट’, बहसों का शोर और ठहाके बाहर बरामदे में भी हमें कुछ पाठ पढ़ा देते थे. ठाकुर प्रसाद सिंह के नेतृत्त्व में सूचना विभाग, सूचना केन्द्र, हिंदी संस्थान और शहर के कई मुहल्लों में कवि-गोष्ठियां हुआ करती थीं जिनमें नये रचनाकारों को सुना और प्रोत्साहित किया जाता था.

एक बार मैंने अपनी एक कविता में घड़े के तलवे सेलिख दिया था. कविता सुना चुकने के बाद नरेश सक्सेना जी ने पास आकर कहा था कि घड़े के तले सेहोना चाहिए, तलवा तो जूते-चप्पल का होगा. इस तरह सिखाने-समझाने का माहौल था. एक बार नरेश जी स्वतंत्र भारतमें तुगलक नाटककी रिपोर्ट पढ़कर लेखक न. जो. को ढूंढते हुए भी दफ्तर आये थे. मैं तब इसी संक्षिप्त नाम से समीक्षा लिखता था. वह उनसे पहली मुलाकात थी. मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि तुम जरूर विज्ञान के विद्यार्थी होगे. कुछ लिखे की तारीफ करना और लिखते रहने को प्रेरित करने का उनका सिलसिला आज तक जारी है. बीर राजा, प्रबोध मजूमदार, राजेश शर्मा, गोपाल उपाध्याय, श्रीलाल शुक्ल, जैसे रचनाकार नये लेखकों-पत्रकारों को पढ़ते और खूब प्रोत्साहित करते थे. कभी यशपाल जी से मिलने जाते तो वे कहते थे कि चाहे कागज पर गोले बनाते रहो लेकिन रोजाना कम से कम दो घंटे बैठ कर नियमित लिखने का अभ्यास करो.

***

कानपुर के, और देश के भी श्रमिक-आंदोलन के लिए छह दिसम्बर 1977 काला दिन साबित हुआ. जयपुरिया परिवार में वर्चस्व की लड़ाई ने स्वदेशी कॉटन मिल्स की हड़ताल को भयानक हिंसा में बदल दिया. एक हजार से ज्यादा हड़ताली मजदूरों पर गोलियां चलीं, कई मारे गये, आगजनी और तोड़-फोड़ के बाद मिलें बंद हो गईं. स्वामित्व की इस जंग का असर लखनऊ के द पायनियर लिमिटेडपर भी पड़ा. सम्पादकीय स्वतंत्रता पर प्रबंधकीय अंकुश की शुरुआत हो गयी. कॉटन मिल्स के एक मैनेजर लखनऊ बैठने लगे. इमारत के प्रबंधकीय हिस्से से मैनेजिंग एडिटर सम्पादकीय हिस्से में आ गये. पायनियर के पहले भारतीय सम्पादक और समूह के सम्माननीय संरक्षक व सलाहकार, बुजुर्ग एस एन घोष को एक छोटे कक्ष में स्थानान्तरित करके उनके विशाल कक्ष में मैंनेजिंग एडिटर की दमदार आवाज गूंजने लगी. थोड़ी-थोड़ी देर में चपरासीssss’ की उनकी कर्कश चीख हमारे कानों को चीरती थी.

अशोकजी और मैनेजिंग एडीटर डॉ के पी अग्रवाल के अगल-बगल के कक्ष एक नन्ही खिड़की से जोड़ दिये गये थे. सलाह-मशविरे होते रहते होंगे. एक सुबह डॉ अग्रवाल सीधे सम्पादकीय विभाग में आ पहुंचे. जिला डेस्क के प्रभारी वीरविक्रम बहादुर मिश्र से उन्होंने कहा- गोण्डा से शिकायत आ रही है कि वहां की खबरें कम छप रही हैं, क्या बात है? ध्यान दीजिए.
जोर से बोलने वाले डॉ अग्रवाल की आवाज अपने कक्ष में बैठे अशोक जी ने सुन ली. उस दिन दोनों कक्षों के बीच की खिड़की शायद नहीं खुली. अशोक जी के कमरे से एक कागज सेवक के हाथों बगल के कक्ष में पहुंचा. थोड़ी देर में वही कागज सेवक के ही हाथों डॉ अग्रवाल के कमरे से अशोक जी के कमरे में वापस आया. कुछ समय बाद अशोक जी के निर्देश से वह कागज सम्पादकीय निर्देशों के रजिस्टर में नत्थी हो गया.

अशोक जी ने लिखा था- प्रिय डॉ अग्रवाल, आपको सम्पादकीय विभाग के किसी सदस्य से कोई भी बात मेरे ही माध्यम से कहनी चाहिए.

डॉ अग्रवाल ने विनम्र शब्दों में अपने हाथ से लिखा था- “प्रिय अशोकजी, आपका मान रहे, आगे ऐसा ही होगा.
हमने अशोकजी पर गर्व किया और मान लिया कि अब कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. वह हमारी भूल थी. वक्त करवट ले चुका था.

अक्टूबर, 1978 में इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स का राष्ट्रीय सम्मेलन चित्रकूट में हुआ था. अशोक जी अतिथि के रूप में उसमें शामिल होने गये थे. वहां उन्हें दिल का दौरा पड़ा. तत्कालीन पेट्रोलियम एवं रसायन मंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा भी सम्मेलन में मौजूद थे. उनके हेलीकॉप्टर से अशोक जी को लखनऊ लाया गया. जब वे हृदयाघात से उबरते हुए घर पर आराम कर रहे थे तभी उन्हें बताया गया कि वे अब स्वतंत्र भारतके सम्पादक का दायित्व उठाने की स्थिति में नहीं हैं. उन्हें हटाने का रास्ता शायद कब से ढूंढा जा रहा था. फिर ऊपर जो भी घटित हुआ होगा, अशोकजी को परामर्शदाताबना दिया गया और उनके सम्पादन में स्वतंत्र भारत सुमनसाप्ताहिक निकालने का भी फैसला किया गया. अशोक जी ने सुमननिकालने में भी अपने सम्पादकीय कौशल, अनुभव और सम्पर्कों का बढ़िया इस्तेमाल किया.
रवींद्रालय में सुमनका लोकार्पण कार्यक्रम था. अंत में अशोकजी ने मंच से घोषणा की कि सुमनका प्रवेशांक हॉल के बाहर श्री इंदु अग्रवाल से प्राप्त किया जा सकता है. इंदु अग्रवाल कार्यालय सहायक थीं. सुनने वाले सभी चौंके थे और हमने सोचा था इंदु के लिए अशोक जी के मुंह से श्रीगलती से निकल गया होगा. बाद में हमने पूछा तो उन्होंने बताया कि कुमारीऔर श्रीमतीअंग्रेजी के मिसऔर मिसेजके लिए प्रचलित हो गया है लेकिन हिंदी में महिला-पुरुष दोनों के लिए श्रीउपयुक्त है. कुमारीया श्रीमतीन लिखना हो तो श्रीऔर भी उपयुक्त है. तब तक सुश्रीका चलन शायद नहीं हुआ था.  

साप्ताहिक पत्रिका स्वतंत्र भारत सुमनअप्रैल, 1979 में शुरू हुई और पसंद की जाने लगी थी लेकिन अशोक जी का दोतरफा घायल दिल ज्यादा बर्दास्त नहीं कर सका. 18 अगस्त, 1979 को 63 साल की अवस्था में उनका देहांत हो गया.

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अशोकजी का स्नेह-सानिध्य हमें दो साल ही मिल पाया. ये दो साल बहुत महत्वपूर्ण और मजबूत नींव डालने वाले साबित हुए. उनका शिष्य होना कितना मानी रखता है, यह हमें मई 1978 में दैनिक हिंदी ट्रिब्यून के इण्टरव्यू में पता चला. चण्डीगढ़ से हिंदी ट्रिब्यून के प्रकाशन का विज्ञापन देख कर मैंने और मनोज तिवारी ने आवेदन भेज दिया. वहां से इण्टरव्यू का बुलावा आ गया. हमने जाने से पहले अशोक जी को बताना ठीक समझा. उन्होंने कहा कि खर्चा दे रहे हैं तो चण्डीगढ़ घूम आओ. इंटरव्यू बोर्ड में प्रेम भाटिया, मदन गोपाल जैसे वरिष्ठ सम्पादक थे. उन्होंने हमारे बारे में कम, अशोकजी के बारे में ज्यादा बातचीत की और हमें पूरे वेतनमान पर (जो करीब साढ़े छह सौ रु था) उप-सम्पादक बनाने को राजी हो गये. स्वतंत्र भारतमें हमें तब चार-सौ रु मिलते थे. अशोक जी की बात मान कर हम एक दिन चण्डीगढ़ घूम कर वापस लौट आये.

अशोकजी के बारे में बहुत सी बातें हमने उनके निधन के बाद जानीं. जैसे, यह कि वे अच्छे लेखक और अनुवादक, बल्कि श्रेष्ठ रूपान्तरकारथेकि हास्य-व्यंग्य उनका प्रिय विषय था और हजामत का मैचनाम से उनका व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित हुआ था, कि बच्चों के लिए उन्होंने कुछ कहानियां लिखी थीं, कि संस्कृत महाकवि बाणभट की कादम्बरीसमेत संस्कृत से भी कुछ अनुवाद किये (बच्चों के लिए कादम्बरी का अत्यन्त सरल अनुवाद केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से 1974 में इसी शीर्षक से प्रकाशित हुआ था), कि रणभेरीनाम से उनकी कविताओं का कविता संग्रह छपा था, कि उन्होंनेहू इज कैलीडासासमेत कई व्यंग्य एकांकी लिखे, कि सत्रह साल भारत सरकार की सेवा में रहते उन्होंने दूसरे नामों से जनसत्तासमेत कई पत्रों में बहुत कुछ लिखा (1953-55 के दौरान वेंकटेश नारायण तिवारी के सम्पादन में जनसत्ताप्रकाशित हुआ था. प्रभाष जोशी के सम्पादन में जनसत्ता 1984 में दोबारा निकला), कि उन्होंने रजनी कोठारी की चर्चित पुस्तक पॉलिटिक्स इन इण्डियाका हिंदी रूपांतरण (भारत में राजनीति) किया था (कोठारी की भारत में राजनीतिपढ़ते हुए कहीं भी यह नहीं लगता कि यह हिन्दी की मौलिक पुस्तक नहीं है), कि हिंदी टेलीप्रिण्टर का की-बोर्ड बनाने में उनकी सहायता ली गयी थी, कि आकाशवाणी से हिंदी में क्रिकेट का आंखों का हाल सुनाने वाले सबसे पहले कमेण्टेटर वे ही थे, कि चौकाऔर छक्काउनके दिये हुए नाम हैं, कि केंद्र सरकार के सूचना विभाग में रहते हुए उन्होंने हिंदी अखबारों की अंग्रेजी विज्ञप्तियों पर निर्भरता खत्म की थी, कि प्रकाशन विभाग में उप-निदेशक बनने के बाद उन्होंने आजकलएवं बाल-भारतीपत्रिकाओं को स्तरीय बनाया था, आदि-आदि.

उनका ज्यादातर काम आज तक बिखरा पड़ा है. कुछ चीजों के दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं हैं. मसलन, यही ठीक-ठीक पता नहीं कि उन्होंने हिंदी में पहली बार किस क्रिकेट मैच का आंखों देखा हाल आकाशवाणी से सुनाया था. अंग्रेजी कमेण्टेटर विजी (महाराज विजयनगरम)  के साथ हिंदी में सुनाया अवश्य था, यह उन्होंने स्वतंत्र भारतकी रजत जयंती के अवसर पर लिखे लेख में खुद भी बताया है –“आकाशवाणी से क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाने का सुझाव सबसे पहले स्वतंत्र भारतने दिया और इन पंक्तियों के लेखक ने रेडियो पर पहली बार हिंदी में क्रिकेट के खेल का हाल सुना कर नई परम्परा की शुरुआत की.” एक अनुमान  है कि वह 23 से 26 अक्टूबर, 1952 में भारत-पाकिस्तान के बीच लखनऊ में खेला गया टेस्ट मैच रहा होगा. उधर, अशोकजी के पुत्र अरविंद को ऐसा स्मरण है कि पिताजी एमसीसी (मेलबोर्न क्रिकेट क्लब, इंग्लैण्ड की क्रिकेट टीम पहले इसी नाम से जानी जाती थी) के साथ हुए मैच का हिंदी में आंखों देखा हाल सुनाने का जिक्र करते थे. 

उनके द्वारा हिंदी में रूपांतरित कुछ अन्य पुस्तकों की पुष्टि होना भी बाकी है. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की शोध वृत्ति के तहत अशोक जी पर हुआ अध्ययन भी सुनी-सुनाई बातों और अपुष्ट जानकारियों तक सीमित रह गया.   
हास्य-व्यंग्य के प्रति अशोक जी की सुरुचि स्वतंत्र भारतके अत्यंत लोकप्रिय दैनिक स्तम्भ कांव-कांवसे भी पता चलती थी. शुरू में इसका नाम काकभुशुण्डि उवाच” था और अशोक जी स्वयं इसे लिखते थे. बाद में इसका नाम कांव-कांवरखा गया और सम्पादकीय टीम के बलदेव प्रसाद मिश्र, योगींद्रपति त्रिपाठी, अखिलेश मिश्र समेत बेधड़क बनारसी जैसे हास्य लेखक भी इसमें योगदान करने लगे. खबरों के शीर्षकों, नेताओं के बयानों और दैनिक घटनाओं पर छोटी किंतु चुटीली गद्य-पद्य टिप्पणियों वाला यह स्तम्भ अखबार की पहचान बना, नई पीढ़ियां इससे जुड़ती गईं और शायद ही यह स्तम्भ कभी बंद हुआ हो. 2002 में जब मैं हिंदुस्तान का स्थानीय सम्पादक बनकर पटना गया तो जनरल मैनेजर के पी अग्रवाल के आग्रह पर, जो 1975 में लखनऊ के पायनियर प्रेस में रह चुके थे, ‘कांव-कांववहां भी शुरू किया, जिसे बिहार में बहुत पसंद किया गया. बाद में इसी तरह का दैनिक स्तम्भ लखनऊ के हिंदुस्तानमें  लखनलाल के तीरनाम से चलाया.

अशोकजी पत्रकारों की आर्थिक और कार्य स्थितियों के लिए भी चिंतित रहने वाले सम्पादकों में थे. 1948 में यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन की स्थापना में उनका भी योगदान था. उन्होंने इसके पहले सम्मेलन में सक्रियता से भाग लिया और उसका संविधान बनाने में मदद की थी. श्रमजीवी पत्रकारों के संगठनों के सम्मेलनों मे वे अंत तक शिरकत करते रहे थे. एक सम्मेलन में विश्वमित्रके सम्पादक फूलचंद्र अग्रवाल ने पत्रकारों को श्रमजीवी कहने पर आपत्ति की तो अशोक जी ने उस पर व्यंगात्मक टिप्पणी तक लिखी थी.

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हमारे दौर के अशोकजी का स्वतंत्र भारतयानी 1977-79 का अखबार अपनी राजनैतिक रिपोर्टिंग में शासन-प्रशासन का निर्मम आलोचक नहीं लगता था. स्वतंत्र भारत के शुरु-शुरु के अंक पलटते हुए उसकी खबरें तीखी लगती थीं. सन 1947 के किसी अंक का पहले पेज का एक शीर्षक अभी तक याद है- त्यागी नेताओं को नवाबी ठाठ का शौक. खबर यह थी कि देश की नयी सरकार के मंत्री अपने बंगलों के लिए विदेशी कालीन और फर्नीचर मंगा रहे हैं. खबर आक्रामक अंदाज़ में लिखी गयी थी. अखबार के यह तेवर अशोक जी के दूसरे कार्यकाल में नहीं रह गये थे. 1977 में हम युवा स्वतंत्र भारतकी राजनैतिक रिपोर्टिंग से बहुधा असंतुष्ट रहते थे, जो हमें अक्सर सत्ता-मुखी लगती थी. एकमात्र विशेष सम्वाददाता शिवसिंह सरोजकी खबरें अति सामान्य और कभी मुख्यमंत्री की प्रशंसा में होतीं थी. हलकी-फुलकी आलोचना यदा-कदा ही छपती थी. दूसरे सम्वाददाता भी उन्हीं की लकीर पर चलते थे. तब भी, स्थितियां आज की तरह समर्पण या सौदे वाली कतई नहीं थी. सम्पादकों-पत्रकारों की ठसक कायम थी. हां, अपने सम्पादकीयों में अशोकजी बहुत निर्मम, कटु आलोचक हो जाते थे.  

अशोकजी स्वतंत्रता पूर्व की उस पीढ़ी के सम्पादक थे जिनका अपने समय के राजनैतिक नेताओं से घनिष्ठ सम्पर्क, बल्कि दोस्ताना रहा था. यह दोस्तियां अखबार में लगभग नहीं निभाई जाती थीं, यह भी कहा जाता था. लेकिन सन 1947 से 1977 आते-आते बहुत कुछ बदल गया था. सम्पादक-नेताओं के रिश्ते ही नहीं, अखबार मालिकों के अपने स्वार्थ भी हावी हो रहे थे. यह संतुलन अशोकजी ने निश्चय ही साध रखा होगा यद्यपि सता-प्रतिष्ठान से अपने लिए सीधे कोई लाभ उन्होंने नहीं लिया. तब भी प्रबंधन उनका विकल्प तलाशने लगा था, यह बाद की स्थितियों ने साबित किया.

1947 से 1979 का समय हिंदी पत्रकारिता के मिशन से व्यावसायिक बनने का दौर था. पत्रकारिता, अखबार घराने और उनके मूल्य सब क्रमश: बदल रहे थे. पत्रकारिता कुछ नये औजार और कौशल पा रही थी तो कुछ मूल्य छूट रहे थे. 

पत्रकारिता की भाषा के रूप में हिंदी विकसित हो रही थी तो विकृत भी बन रही थी. इस क्रम में नयी-पुरानी पीढ़ी के टकराव भी हो रहे थे.

समाज भी इस दौरान बहुत बदला. मध्य-वर्ग और बाजार क्रमश: बढ़ा. शिक्षा ने अन्तरराष्ट्रीय दरवाजे ज्यादा खोले तो भारतीय शहरों में यूरोप और पश्चिमी दुनिया का प्रभाव बढ़ा. गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा. अखबारों का आकार और प्रसार भी. बदलते भारत के इस दौर की पत्रकारिता में अखबार शहरी मध्य-वर्ग के ज्यादा करीब होते गये. अखबारों ने उद्योग  का रूप लेकर मुनाफे की राह पकड़ी. इस प्रयास में समाज के पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, किसानों और गांवों को हिंदी के अखबार भी भूलते गये या हाशिये पर रखे रहे. (स्वतंत्र भारत में 1979 तक प्रति सप्ताह छपने वाली गांव की चिट्ठीधीरे-धीरे गायब हो गयी). उन दिनों रघुवीर सहाय के सम्पादन में टाइम्स ऑफ इण्डिया समूह का दिनमानजरूर हमें महिलाओं एवं दलित-वंचित वर्गों को देखने की नयी दृष्टि दे रहा था. ज्यादातर हिंदी अखबारों का इनके प्रति नजरिया दकियानूसी बना रहा.

उस दौर के लगभग सभी अखबारों एवं सम्पादकों ही की तरह अशोकजी के पास भी उच्च जातीय हिंदू पत्रकारों की टीम थी. मगर किसी हिंदी अखबार में महिला पत्रकार को भर्ती करने का श्रेय भी अशोकजी को जाता है. जब 1975 में द पायनियर की पहली (और सम्भवत: प्रदेश की भी) महिला रिपोर्टर बनी मेहरू जाफर एक साल की छुट्टी में यूरोप गयीं और 1977 में वापस लौटने पर द पायनियर ने उन्हें वापस लेने से इनकार कर दिया तो अशोक जी ने मेहरू को स्वतंत्र भारतका सम्वाददाता बना लिया. बकौल मेहरू जाफर- अशोकजी एक मुसलमान युवती को अपनी रिपोर्टर बनाकर बहुत खुश हुए थे और सीधे विधान सभा की रिपोर्टिंग करने की बड़ी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी. अपनी टाइपिस्ट इंदु अग्रवाल को भी वे लिखने-पढ़ने और अंग्रेजी से अनुवाद करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे. 1977 में उन्होंने ताहिर अब्बास को भी नये पत्रकारों की अपनी टीम में शामिल किया था और उनसे उर्दू प्रेस समेत मुस्लिम मामलों पर लिखवाया करते थे. यह तथ्य भी नोट किया जाना है कि तब हिंदी में दलित एवं महिला पत्रकार ढूंढने से भी नहीं मिलते थे.

आपातकाल के बाद, 1977 से हिंदी पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य बहुत तेजी से बदला. इमरजेंसी ने मध्य वर्ग की राजनैतिक चेतना को झकझोरा था जिससे पत्र-पत्रिकाओं की पाठक संख्या में भारी वृद्धि होने लगी. कई नये अखबार और पत्रिकाएं प्रकाशित हुए. लखनऊ में जहां, 1977 तक सिर्फ स्वतंत्र भारतऔर नवजीवन दैनिक प्रकाशित होते थे (आरआरएस से सम्बद्ध एक तरुण भारतभी था) वहीं 1980 आते-आते दैनिक जागरणऔर अमृत प्रभातने भी अपने प्रेस जमा लिये. उसके दो-तीन वर्ष बाद नव भारत टाइम्स और राष्ट्रीय सहाराभी आ गये. पत्रकार और पत्रकारिता, दोनों की स्थितियों में बड़े बदलाव दिखने लगे थे.


अशोक जी के साथ पराड़कर युगीन पत्रकारिता के अवशेष भी खत्म हुए थे. नया दौर हर स्तर पर बड़े उलट-फेर करने की मुकम्मल तैयारी के साथ आ रहा था.   

(समाप्त)

Friday, February 16, 2018

हमने पकड़ी पत्रकारिता की वह अंगुली - 3


सम्पादक की कलम
सन 1865 में एक अंग्रेज व्यापारी जॉर्ज एलन ने इलाहाबाद से अंग्रेजी अखबार द पायनियर शुरू किया था. प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किप्लिंग ने अपनी युवावस्था में इसमें काम किया. बाद में ब्रिटिश प्रधानमंत्री बने विंस्टन चर्चिल कभी इसके युद्ध सम्वाददाता रहे थे. जुलाई, 1933 में द पायनियरभारतीय उद्यमियों के एक सिण्डिकेट के हाथों बिक गया और लखनऊ से छपने लगा. इसके संचालक मण्डल में मौरावां के कुंवर गुरुनारायण, लाला हरीराम सेठ, कोटरा के राजा विश्वेश्वर दयाल, कोयल के राजा युवराजदत्त सिंह, प्रयागपुर के राजा वीरेंद्रविक्रम सिंह जैसे हिंदी प्रेमी शामिल थे. इन हिंदी प्रेमियों ने द पायनियरके साथ आजादी की पहली सुबह से एक हिंदी अखबार शुरू करने की ठानी. ऐसे अखबार का नाम स्वतंत्र भारतसे सुंदर एवं सटीक और क्या हो सकता था.

यह नाम रखने में एक दिक्कत थी कि सम्पादकाचार्य अम्बिका प्रसाद बाजपेयी कलकत्ता से स्वतंत्रनाम से अखबार निकालते थे. संयोग से उन दिनों वह बंद था. बाजपेयी जी ने अनुमति दे दी. सम्पादक की तलाश अशोक जी के नाम पर पूरी हुई, जो तब वाराणसी में बाबू विष्णुराव पराड़कर और कमलापति त्रिपाठी के साथ संसारपत्र में काम कर रहे थे. संसार पहले दैनिक और साप्ताहिक था. अशोक जी इनके साथ ही प्रकाशित होने वाले ग्राम संसारके सम्पादक भी थे. पराड़कर जी काशी के बलदेव प्रसाद गुप्त के प्रसिद्ध अखबार आजके सम्पादक हुआ करते थे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलनमें आज बंद हो गया तो गुप्त जी ने 1943 में संसारशुरू कराया था. गुप्त जी से अशोकजी की रिश्तेदारी थी और वही उन्हें संसारमें लाये थे. 1944 में  कुछ समय के लिए अशोक जी दैनिक अधिकारका सम्पादन करने लखनऊ भी आये थे.

बनारस के एक सम्पन्न अग्रवाल परिवार में जन्मे अशोकनाथ, गांधी जी के प्रभाव में आकर बचपन में सिर्फ अशोक और बाद में अशोक जी बन गये थे. काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बी ए और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास में एम ए करने के बाद वे पीएचडी करके अध्यापन को पेशा बनाना चाहते थे. उन्होंने हरिश्चंद्र हाईस्कूल, काशी में पढ़ाने के साथ शोध कार्य भी शुरू कर दिया था लेकिन भविष्य उनके लिए दूसरी ही भूमिका तैयार कर रहा था. काशी के कुछ मित्रों ने, जिनमें बेधड़क बनारसी जैसे हास्य कवि भी थे, ‘तरंगनाम से हास्य-पत्रिका निकालने की ठानी और अशोकजी को भी उसके सम्पादन में शामिल कर लिया. फिर तो पीएचडी और अध्यापकी धरी रह गयी. अध्यापकी छोड़ने का एक कारण उनकी गले की बीमारी भी थी, जिसके इलाज में डॉक्टरों ने कम बोलने वाला पेशा अपनाने की सलाह दी थी. शैक्षिक जगत के नुकसान का तो पता नहीं, लेकिन हिंदी पत्रकारिता को एक समर्पित सेवक एवं प्रवर्तक अवश्य मिला.

अशोकजी ने स्वयं लिखा है कि “पायनियरके पहले भारतीय सम्पादक सुरेंद्रनाथ घोष थे. स्वतंत्र भारतके सम्पादक के लिए मेरा नाम उन्होंने ही कुंवर गुरुनारायण के सामने रखा था और प्रत्येक कदम पर उनका स्नेहपूर्ण पथ-प्रदर्शन स्वतंत्र भारतको मिला. पायनियरमें सम्पादकीय स्वतंत्रता और निष्पक्षता की जो उदात्त परम्परा थी, वह स्वतंत्र भारत को दान में मिली.’’

पंद्रह अगस्त, 1947 को देश की स्वतंत्रता की पहली प्रात: वेला में स्वतंत्र भारतका पहला अंक निकालना कितना रोमांचक और हर्षोल्लास का अवसर रहा होगा. और भी रोमांचित हो जाता हूं यह सोच कर कि सम्पादक अशोक जी तब 31 वर्ष के रहे होंगे. अगस्त 1977 में जब पहली बार उनके सामने खड़ा था तो मैं 21 वर्ष का था और 61 साल के अशोक जी को देख रहा था. हिंदी पत्रकारिता के 30 साल के ऊबड़-खाबड़ सफर ने उनसे खूब वसूली कर ली थी.

कैसी रही होगी अशोक जी की पहली सम्पादकीय टीम! हमें बताया गया कि कुल छह लोग थे और शायद कोई भी अनुभवी न था. उनमें से दो धुरंधरों से बाद में मिलने का सौभाग्य मिला- उपेंद्र बाजपेयी और अखिलेश मिश्र. उपेंद्र जी अम्बिका प्रसाद बाजपेयी के सुपुत्र थे जो स्वतंत्र भारतके बाद दिल्ली जाकर हिंदुस्तान टाइम्समें बरसों-बरस राजनीतिक सम्वाददाता और विश्लेषक रहे. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन में सक्रिय और मीडिया सेण्टर के संथापकों में रहे. अखिलेश मिश्र प्रखर विचारक, अपनी भाषा-बोली-मुहावरे के योद्धा, जनता के खांटी पत्रकार और सम्पादकीय सरोकारों के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. उन्होंने प्रचुर मात्रा में सार्थक लेखन किया. उन्हें जानने के लिए उनकी एक ही किताब मिशन से मीडिया’ (सम्पादन-वन्दना मिश्र, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) काफी होगी.

एक और हस्ती से मिलने और थोड़ा जानने का मौका मिला- एस एन निगम, जो मुंशी जी के नाम से बेहतर जाने जाते रहे. ठीक मालूम नहीं कि मुंशी जी स्वतंत्र भारतकी शुरुआती टीम में थे या बाद में शामिल हुए. 1977-78 में जब हम उनसे मिले तब वे महानगर के अपने घर में थियोसॉफिकल सोसायटी चलाते थे जिसका विशाल पुस्तकालय हमें आकर्षित और आतंकित भी करता था. वे स्वतंत्र भारतके समाचार सम्पादक थे जब दैनिक जागरण ने अपना अंग्रेजी दैनिक डेली नेशनशुरू करने के लिए उन्हें सम्पादक के रूप में कानपुर बुलाया. जागरण के सम्पादकीय साथियों ने जब उन्हें वहां के हालात बताये तो वे मालिकों से यह कह कर लखनऊ लौट आए कि पहले पत्रकारों की स्थितियां ठीक करिए. देश-सेवा में बाधा न हो इसलिए सन्तान नहीं पैदा करने की शपथ ली और निभायी. स्वतंत्रता सेनानी को मिलने वाली पेंशन लेने से इनकार कर दिया था. उनकी पत्नी सावित्री निगम एलआईसी का काम करके खर्च निकालती थीं. एक बार किसी शुभेच्छु, नगर महापालिका कर्मचारी ने उनका गृह-कर कम कर दिया तो लड़ने चले गये थे. मेडिकल कॉलेज में जब उनकी मृत्यु हुई तो मैंने उनकी वृद्ध पत्नी को मुंशी जी के नेत्रदान के संकल्प को पूरा कराने के लिए दौड़ते-गिड़गिड़ाते देखा था.

हमने इन विद्वान पत्रकारों और दुर्लभ गुणी मनुष्यों को उनकी वृद्धावस्था में देखा यद्यपि उनकी प्रखरता शायद ही मद्धिम पड़ी हो. वे खूब पढ़ने-लिखने वाले, देश-दुनिया के हालात से वाकिफ, अपनी सांस्कृतिक जड़ों से सिंचित, सामाजिक-राजनैतिक हालात से चिंतित, निडर एवं स्पष्ट वक्ता और अपने जीवन-मूल्यों से प्रतिबद्ध पत्रकार थे. एक बार मुंजी जी के घर की छत पर बैठे हुए मैंने कपूरथला चौराहे की दिशा बिल्कुल गलत इंगित कर दी थी. मुंशी जी ने सही किया तो मैं कह बैठा- मुझे दिशा-भ्रम हो गया.उन्होंने फौरन टोका था- आपको दिशा-ज्ञान है? भ्रम उसे हो सकता है जिसे ज्ञान हो.

एक दिन किसी अखबार के बैनर शीर्षक में किसी लम्बी यात्रा के लिए महायात्राशब्द देख कर अखिलेश जी नये पत्रकारों की अज्ञानता पर बहुत देर तक आवेश में बोलते रहे थे- इन्हें पता ही नहीं कि महा उपसर्ग का अर्थ क्या होता है. महायात्रा माने अंतिम यात्रा, शव यात्रा.आज के बहुत सारे हिंदी पत्रकारों को उपसर्गऔर प्रत्यय भी मालूम न होगा कि क्या होता है.

तो, ऐसे पत्रकारों की टीम का नेतृत्व किया था अशोक जी ने. क्या माहौल रहता होगा, कैसे विचार-विमर्श और तर्क-वितर्क होते होंगे. सम्पादकीय लिखते हुए, शीर्षक बनाते समय बहस होती होगी और कभी तकरार भी. 15 अगस्त, 1947 के पहले अंक का सम्पादकीय क्या हो, इस पर प्रबंधन की राय बनी कि द पायनियर के लिए अंग्रेजी में लिखा गया सम्पादकीय हिंदी में अनुवाद करके दे दिया जाए. अशोकजी इससे सहमत नहीं हुए. उन्होंने स्वतंत्र भारतके लिए अपना अलग सम्पादकीय लिखा-

“मुंह में हंसी और हृदय में रुदन लेकर हम आज स्वतंत्रता का स्वागत कर रहे हैं. सदियों से अवरुद्ध स्वाधीनता-मंदिर के द्वार खुले भी तो इष्ट देवता की मूर्ति खण्डित पड़ी है. हमें मंदिर खुलने का आनंद है, पर मूर्ति खण्डित होने का शोक भी कम नहीं है..... हम चाहते हैं आनंद में मत्त होना, उल्लास में डूब जाना और उमंगों में बहना, पर लाहौर की ज्वालाएं, और कलकत्ते-अमृतसर के आर्त्तनाद हमें ऐसा करने नहीं देते...”

छोटे आकार के, पांच कॉलम वाले छह पृष्ठों के स्वतंत्र भारतके पहले पन्ने पर तिरंगा थामे प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की फोटो थी, राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में हुई संविधान सभा की बैठक की खबर थी और संयुक्त प्रांत (तब का उत्तर प्रदेश) की पहली गवर्नर सरोजिनी नायडू  के शपथ ग्रहण की तस्वीर भी प्रकाशित हुई थी.

अशोकजी ने स्वतंत्र भारत को समाचार पत्र के अलावा लखनऊ का साहित्यिक-सांस्कृतिक अड्डा भी बनाया और बहुत सारे लेखकों, विद्वानों, कलाकारों को उससे जोड़ा. उस समय लखनऊ में इस अड्डे की जरूरत भी थी. दुलारे लाल भार्गव जी की ख्यातिनाम पत्रिका सुधाबंद हो चुकी थी और माधुरी’ (1922-50) का स्वर्णिम समय बीत चुका था. यशपाल का विप्लव’ (नवम्बर 1938- अप्रैल, 1949) भी सरकारी कोप के व्यवधान झेलता अपने अंतिम वर्षों की ओर बढ़ रहा था. कम्युनिस्ट पार्टी का दैनिकअधिकारबंद था. स्वतंत्र भारतजल्दी ही स्थापित-सम्मानित पत्र बन गया. एक महीने ही में विक्री का आंकड़ा पांच हजार के पार हो गया था.

सन 1953 में अशोकजी केंद्र सरकार के सूचना विभाग में सूचना अधिकारी बन कर चले गये तो अपने योग्य सहयोगी योगेंद्रपति त्रिपाठी को स्वतंत्र भारतका सम्पादक बना गये, जिनसे उनकी भेंट 1944 में दैनिक अधिकारमें हो चुकी थी और जिन्हें वे स्वतंत्र भारतमें ले आये थे. हमारे वरिष्ठ साथी त्रिपाठी जी का नाम बहुत श्रद्धा और सम्मान से लेते थे. कहते कि उन्होंने अखबार को अशोकजी से भी बेहतर ढंग से चलाया और विकसित किया. 1971 में त्रिपाठी जी की मृत्यु हो गयी. तब मालिकों के आग्रह पर अशोकजी 1971 के अंत में पुन: स्वतंत्र भारतके सम्पादक होकर लखनऊ आ गये. त्रिपाठी जी के बड़े पुत्र शचींद्र त्रिपाठी स्वतंत्र भारत में हमारे वरिष्ठ थे जो बाद में नवभारत टाइम्स, बम्बई चले गये और उसके स्थानीय सम्पादक होकर रिटायर हुए.

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25 जून, 1975 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने बढ़ते राजनैतिक विरोध को कुचलने और अपनी सत्ता बचाने के लिए देश में आंतरिक आपातकाल लागू कर दिया था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से उनका निर्वाचन अवैध ठहरा दिया था. विरोधी नेता गिरफ्तार कर जेल में डाले गये और अखबारों पर सेंसर लगा दिया गया. अखबारों में कौन-सी खबरें नहीं छपेंगी या किस तरह छपेंगी, यह देखने के लिए सूचना विभाग और पत्र सूचना कार्यालय के अधिकारियों को सेंसर-अधिकारी के रूप में तैनात किया गया था.

स्वतंत्र भारतके सम्पादकीय निर्देश रजिस्टर के जो कुछ पेज मेरे पास सुरक्षित हैं, उनमें से कुछ सेंसर-अधिकारियों के निर्देश भी हैं. सेंसर अधिकारी नियमित फोन करके सम्पादक, समाचार सम्पादक या समकक्ष वरिष्ठ पत्रकार को कुछ निर्देश लिखवाते थे, जो जाहिर है उन्हें दिल्ली से मिलते होंगे. फोन सुनने वाला इन निर्देशों को सेंसर-अधिकारी के हवाले से लिख कर सभी के ध्यानार्थ रजिस्टर में नत्थी कर देता. इन पर अमल करना अनिवार्य था अन्यथा गिरफ्तारी से लेकर प्रेस-बंदी तक हो सकती थी. इनमें से कुछ आदेशों पर नजर डालने से पता चलेगा कि इमरजेंसी में अखबारों पर किस तरह का अंकुश था.

“सेंसर अधिकारी, एम आर अवस्थी का फोन, नौ अक्टूबर 1976 को-

1-भारत और अन्य किसी देश के बीच शस्त्रास्त्र अथवा रक्षा समझौते की सूचना तथा उस पर कोई टिप्पणी प्रकाशित न की जाए.

2-बस्ती जिले में बीडीओ तथा एडीओ की हत्या का समाचार न छापा जाए.”

20 जुलाई 1976 को अशोक जी के हस्तलेख और हस्ताक्षर से जारी नोट- “नसबंदी में मृत्यु या अन्य धांधली की खबरें न दी जाएं. प्राप्त होने पर इन्हें समाचार सम्पादक श्री दीक्षित या मुझे दिया जाए.”

बिना तारीख का एक हस्तलिखित नोट- “गुजरात हाईकोर्ट के जजों के तबादले सम्बंधी बहस का कोई समाचार बिना सेंसर कराए नहीं जा सकता.”

10 दिसम्बर 1976 को समाचार सम्पादक के हस्ताक्षर से जारी सेंसर-आदेश- “14 दिसम्बर को संजय गांधी का जन्म-दिवस है. इस संदर्भ में किसी भी कांग्रेसी नेता का संदेश नहीं छपेगा. सूचना विभाग से टेलीफोन पर सूचना मिली.”

17 दिसम्बर 1976 को समाचार सम्पादक के नाम से जारी अंग्रेजी में टाइप, सूचना विभाग से आया सेंसर-आदेश- “ रंगभेद विरोधी दक्षिण अफ्रीकी-भारतीय परिषद के चेयरमैन श्री ए एन मुल्ला का कोई भाषण या वक्तव्य आपके क्षेत्र के किसी भी अखबार में नहीं जाने दिया जाए.”

11 जुलाई, 1976  का टाइप किया हुआ अहस्ताक्षरित नोट- “सूचना विभाग में सेंसर के श्री वाजपेई ने फोन किया था कि सेंसर आदेशानुसार परिवार नियोजन, शिक्षा शुल्क में वृद्धि तथा सिंचाई दरों में वृद्धि के विरुद्ध किसी प्रकार का समाचार न छापा जाए. इसके अतिरिक्त, छात्र-आंदोलन की खबरें भी नहीं छपेंगी.”

28 दिसम्बर (सन दर्ज नहीं) को समाचार सम्पादक के हस्ताक्षर से जारी अंग्रेजी में टाइप किया हुआ “सेंसर-निर्देश- कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और अखिल भारतीय कांग्रेस के भीतर अथवा आपस में विवाद और गुटबाजी के बारे में कोई भी खबर, रिपोर्ट और टिप्पणी कतई नहीं (किल्ड) दी जाए. यह विशेष रूप से केरल, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा कांग्रेस की खबरों पर लागू होगा.”

25 अक्टूबर (सन दर्ज नहीं) का अंग्रेजी में हस्तलिखित नोट- “सेंसर ऑफिस से श्री पाठक का निर्देश- यह फैसला हुआ है कि 29 अक्टूबर से होने वाले चौथे एशियाई बैडमिण्टन टूर्नामेण्ट में चीन की बैडमिण्टन टीम की भागीदारी भारतीय अखबारों में बहुत दबा दी जाए.”  

सभी अखबारों को सेंसर-आदेशों का पालन करना पड़ा था. विरोध के प्रतीक-रूप में कतिपय अखबारों ने एकाधिक बार अपने सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ी. कुछ छोटे लेकिन न झुकने वाले पत्रों ने प्रकाशन स्थगित किया या सरकार ने ही उन्हें बंद कर सम्पादकों-पत्रकारों को जेल में डाल दिया था.

ज्यादातर अखबारों की तरह स्वतंत्र भारतने भी आपातकाल या प्रेस-सेंसरशिप का चुपचाप पालन किया. हमारे वरिष्ठ साथी बताते थे कि 25 जून की 1975 की रात आपातकाल लागू होने के बाद जब अगले दिन सेंसर और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने प्रेस आकर निर्देश जारी करने शुरू किये और जांच-पड़ताल करने लगे तो अशोक जी को सूचना दी गयी. वे फौरन दफ्तर आये और तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा को फोन करके इस पर विरोध जताया था. उसके बाद बहुगुणा जी उनसे मिलने भी आये थे, हालांकि वे कुछ कर नहीं सकते थे.  यह मुलाकात सिर्फ औपचारिकता रही होगी. आपातकाल के दौरान प्रेस सेंसरशिप और बहुत से दमन-अत्याचार के लिए इंदिरा गांधी, उनके बेटे संजय और उनकी चौकड़ी जिम्मेदार थी.

आपातकाल हटने के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस (इ) की बहुत बुरी पराजय हुई. मोरारजी देसाई के नेतृत्त्व में केंन्द्र की सरकार के सभी मंत्रियों को जयप्रकाश नारायण ने राजघाट पर ईमानदारी और शुचिता की शपथ दिलाई. इसे दूसरी आजादी कहा गया. देश भर में बदलाव और उत्साह का माहौल था. लेकिन बहुत जल्दी जनता पार्टी में झगड़े शुरू हो गये.

एक दिन अचानक हमें पता चला कि स्वतंत्र भारत सम्पादकीय में दो नियुक्तियां हो गयी हैं. गुपचुप बताया गया कि आरएसएस के लोग हैं. अन्य अखबारों में भी ऐसे पत्रकारों की भर्ती की खबरें आने लगीं. लालकृष्ण आडवाणी केंद्र में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे ही. संघ की सदस्यता और सक्रियता जनता पार्टी में बड़े झगड़े का करण भी बनी. खैर.


दफ्तर और बाहर भी हम युवकों की टीम एक साथ मिल-बैठ कर खाती-पीती थी. ताहिरअब्बास को हमारे साथ खाते-पीते देख कर नये आये एक संघीपत्रकार ने हमें किनारे ले जाकर कहा- “आप लोग ब्राह्मण होकर मलेच्छ के साथ कैसे खा लेते हैं.” सयाने थे, इसलिए हमने उन्हें मारा तो नहीं लेकिन इतना परेशान किया कि वे दो-तीन महीने में ही भाग खड़े हुए. 

(जारी)